यहां वहां सौ बार
--:भारतका एक ब्राह्मण.
संजय कुमार मिश्र"अणु"
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आंखे झील सी-
ओठ गुलाब सा।
चांद सा मुखडा-
बेहद लाजवाब सा।१।
मोरनी सी चल-
नागिन से बाल।
कोयल सी बोली-
हूँ देखकर बेहाल।२।
संगमरमर सी काया-
और फूलों सी हंसी।
देख मन कहता है-
अद्भुत अपूर्व रुपसी।३।
चाहे जिस किसी से-
मैं दे दूं तेरी उपमा।
तुम से कम लगता है-
है ऐसी तेरी सुषमा।४।
देखने से लगती हो-
तुम सबसे अलौकिक।
इसलिए मेरा तुम्हें-
मध चाहता है अत्यधिक।५।
अपने मन में विचार कर-
मेरे उपर उपकार करो।
मै तेरे नेह का आकांक्षी-
मेरा प्रेम स्वीकार करो।६।
मैंनें मन की बात बता दी-
तुम अपनी बात बता दो।
तुम बिन है जग सुना-सुना-
आ प्रेम सुधा बरसा दो।७।
मिलन हमारा और तुम्हारा-
जब देखेगा यह संसार।
गायेंगें जन प्रेम गीत सब-
यहां वहां सौ बार।८।
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