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बहुत पछ्तायेगा

बहुत पछ्तायेगा

अपना यह चेहरा,
व्यर्थ में नहीं संवारें,
हो सके तो अपना,
यह चरित्र संवारें।

तेरा यह सुन्दर चेहरा, 
कभी भी संवर जायेगा,
गर गिर गया चरित्र, 
संवर नहीं पायेगा।

थोड़ा वक्त निकालकर,
माता पिता पास गुजारें ,
करें उनकी सेवा सत्कार, 
उनका जीवन निखारें।

जब वक्त गुजर जायेगा,
दुबारा आ नहीं पायेगा,
जायेंगे जब दोनो गुजर,
तब बहुत पछ्तायेगा।

नहीं जियें सिर्फ अपने लिए,
समाज के लिए भी विचारें,
विखर रहा जो यह समाज,
थोड़ा उसे भी संवारें। 

विखर गया जो यह समाज,
फिर कभी नहीं बन पायेगा,
बचा लो अपने समाज को,
तेरा भविष्य बन जायेगा।
         ----000---
         अरविन्द अकेला
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