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संसदीय प्रक्रिया में समितियों की भूमिका

संसदीय प्रक्रिया में समितियों की भूमिका

(डॉ. दिलीप अग्निहोत्री-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
संसदीय व्यवस्था के संचालन में समितियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। हंगामे से अप्रभावित रहते हुए संबंधित विषयों पर इनसे गहन विचार विमर्श की अपेक्षा रहती है। सैद्धांतिक रूप से इनकी कार्य प्रक्रिया दलगत निष्ठा से परे रहती है। ये बात अलग है कई बार व्यवहार में इस पर अमल नहीं होता। इसके बाबजूद आदर्श उदाहरणों की भी कमी नहीं है। इनकी स्थापना व्यापक सोच के आधार पर की गई था। व्यवस्थापिका की सदस्य संख्या अधिक होती है। सभी विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श का समय निकालना मुश्किल होता है। इसके अलावा अनेक विषयों पर विशेषज्ञों के विचार जानना भी उचित रहता है। समितियों की संख्या कम रहती है। इसमें विभिन्न पार्टियों का प्रतिनिधित्व भी रहता है। ऐसे में व्यापक विचार करना आसान हो जाता है।
पिछले कुछ समय से संसद व राज्य विधानसभाओं में अधिकांश समय हंगामे जैसी स्थिति रहती है। यूपीए सरकार के समय टू जी और कोयला घोटाले के मुद्दे सामने आए थे। इनकी आंच तत्कालीन सत्ता शिखर तक पहुंच रही है। सरकार द्वारा उचित कदम ना उठाने के कारण संसद में विपक्ष का हंगामा चलता था। वर्तमान समय में सरकार पर ऐसे गंभीर आरोप नहीं है। आज ऐसा कोई विषय नहीं है जिस पर चर्चा न हो सके। सरकार की आलोचना करना व प्रश्न पूछना विपक्ष का अधिकार है। वर्तमान समय में जो समस्याएं है उन पर चर्चा से विपक्ष को अधिक लाभ मिलने की संभावना हो सकती है। बशर्ते वह तथ्यों के आधार पर अपनी बात सदन में रखे। हंगामे में यह सभी बातें सदन के पटल पर नहीं पहुंचती है। इसका यह भी सन्देश जाता है कि विपक्ष के पास तर्क व तथ्यों का अभाव है। इस समय राज्यसभा के बारह सदस्यों के निलंबन पर हंगामा चल रहा है। जबकि इन सदस्यों की सदन में अभद्रता को देश देख चुका है। ऐसा अनुचित आचरण और फिर ऐसा करने वालों के बचाव से विपक्ष की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती। वैसे भी तृणमूल कॉंग्रेस ने कॉंग्रेस से किनारा कर लिया है। उसने कॉंग्रेस नेतृत्व पर सीधा निशाना लगाया है। किसी भी गठबन्धन में उसकी भूमिका को नकार दिया है। ऐसे में निलंबित सांसदों के पक्ष में विपक्षी एकता का दावा हास्यास्पद है। क्या यह एकता मात्र अभद्र आचरण के बचाव तक सीमित है। संसद के शीतकालीन सत्र के पहले राज्यसभा से बारह सांसदों को सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया था। पिछले मानसून सत्र में सदन में अनियंत्रित व्यवहार और आसन की मर्यादा का उल्लंघन करने और सुरक्षाकर्मियों से बदसलूकी की वजह से इन सासंदों को निलंबित किया गया। निलंबित सांसदों में
कांग्रेस के छह शिवसेना के दो तृणमूल कांग्रेस के दो माकपा और भाकपा के एक एक सांसद शामिल हैं। निलंबित सांसद संसद भवन परिसर स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा के नीचे धरना दे रहे हैं। यदि उनके मन में महात्मा गांधी के प्रति सम्मान रहता तो वह उच्च सदन में ऐसा आचरण नहीं करते।
राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सभापति एम वेंकैया नायडू से मुलाकात कर बारह सदस्यों का निलंबन वापस लिए जाने की मांग की थी। वह इस मुद्दे पर विपक्षी एकता की दुहाई दे रहे है जबकि तृणमूल कॉंग्रेस ने कॉंग्रेस पर हमला तेज कर दिया है।
संसदीय व्यवस्था के संचालन में समितियों का महत्व रहता है। लोक लेखा समिति के शताब्दी समारोह में अनेक तथ्यों का उल्लेख किया गया। यह समिति अपने नाम के अनुरूप ही अत्यधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसमें लोक भी है और लेखा भी है। वित्त शासन संचालन का मूल आधार है। संवैधानिक तंत्र में वित्त पर लोक नियंत्रण की सैद्धांतिक व्यवस्था रहती है। संसद की लोक लेखा समिति इस सिद्धांत के अनुरूप कार्य करती है। लोक लेखा समिति के सौ वर्ष पूरे होने पर संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में आयोजित समारोह का आयोजन किया गया। इसका उद्घाटन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया। राष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र में संसद लोगों की इच्छाओं का प्रतीक होती है और संसदीय समितियां इसके विस्तार के रूप में काम करते हुए इसे कार्यकुशल बनाती हैं। संसदीय लोकतंत्र में शासन की जवाबदेही होती है। संसद ही कार्यपालिका को धनराशि जुटाने और खर्च करने की अनुमति देती है। निर्धारित उद्देश्यों के अनुसार धन संग्रह व्यय को देखना उसका कर्तव्य व अधिकार है। लोक लेखा समिति, विधायिका के प्रति कार्यपालिका की प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करती हैं। सौ वर्ष पूर्व सेन्ट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली में लोक लेखा समिति का गठन किया गया था। यह समिति नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के आधार पर विचार करती है। पहले सत्ता पक्ष का सदस्य ही इसका अध्यक्ष होता था। 1967 के बाद यह पद मुख्य विपक्षी दल को मिलने लगा। इनकी नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है। इसमें अधिकतम बाइस सदस्य होते हैं हैं जिसमें से लोकसभा के पन्द्रह सदस्य व अन्य राज्य सभा से लिये जाते है। यह समिति संबंधित विषय पर सिफारिश करती है किंतु यह सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होती है। शताब्दी समारोह में लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी कहा कि समय के साथ लोक लेखा समिति की प्रासंगिकता बढ़ी है। इसके अनुरूप समिति से लोगों की आशाएं और अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। ऐसे में लोक लेखा समिति को अपनी प्रक्रियाओं को लचीला बनाने पर विचार करना चाहिए। समिति और कार्यपालिका को देश के विकास के लिए जवाबदेह बनाना चाहिए। सरकार के कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए। संसद और राज्य विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों का एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाना चाहिए जहां ऐसी समितियां अपनी सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा कर सकें। अपनी सिफारिशों पर की गई कार्यवाही की निगरानी भी कर सकें। संसदीय समितियों को लोगों से सीधे बातचीत करनी चाहिए। उनकी राय लेनी चाहिए। लोगों के साथ जितनी अधिक बातचीत होगी,समिति की सिफारिशें भी उतनी ही प्रभावी और सार्थक होंगी। लोक लेखा समिति को और मजबूत करने तथा भारत की संसद और राज्य विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए। लोक लेखा समितियों के सभापतियों की एक समिति होनी चाहिए। उस समिति को लोक लेखा समितियों के कामकाज पर व्यापक चर्चा करनी चाहिए। इस समिति द्वारा दी गई रिपोर्ट या सुझावों पर पीठासीन अधिकारी चर्चा कर सकते हैं जिससे लोक लेखा समितियों को अधिक जवाबदेह, पारदर्शी और जनता के लिए लाभकारी बनाया जा सके। शासन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के साधनों का व्यापक उपयोग किया जाए। ऑडिट पैरा के समयबद्ध तरीके से निपटान के लिए नवीनतम तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। विधायिका के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही संसदीय लोकतंत्र का आधार है। सार्वजनिक व्यय पर संसद का नियंत्रण केवल देश के शासन को चलाने के लिए आवश्यक धनराशि के लिए मतदान तक ही सीमित नहीं है। बल्कि संसद यह भी सुनिश्चित करती है कि व्यय विवेकपूर्ण ढंग से किया जाए। संसदीय समितियों के बिना संसदीय लोकतंत्र अधूरा हो जाएगा। लोक लेखा समिति को धैर्य और विवेक का प्रदर्शन करने की बड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी रहती है। (हिफी)
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