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विपक्ष के साझा मुद्दे उठाएंगी ममता

विपक्ष के साझा मुद्दे उठाएंगी ममता

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विपक्ष की सर्व सहमत नेता बनना चाहती हैं। इस प्रकार का प्रयास वह बहुत पहले से कर रही थीं जैसे नोटबंदी और जीएसटी का विरोध। इन मुद्दों पर ममता ने देश भर में भ्रमण किया लेकर विपक्ष को एक करके कोई बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा कर सकीं। अब राज्य के विधानसभा चुनाव मंे भाजपा को पटकनी देकर और इसी महीने (2 नवम्बर 2021) उपचुनाव मंे चारों सीटें जीतकर यह साबित कर दिया कि भाजपा का विजय अभियान वहीं रोक सकती है। ममता की पार्टी ने उपचुनावों मंे भाजपा से दो सीटें भी छीनी हैं। इसीलिए वह तेल की बढ़ी कीमतों से कमाई मंे राज्य का हिस्सा मांग रही हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों में बीएसएफ को ज्यादा अधिकार देने का भी वह विरोध कर रही हैं। इन मुद्दों पर विपक्षी दल उनका साथ दे सकते हैं।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विपक्ष की सर्वसम्मत नेता कैसे बनें इसके लिए अगले हफ्ते नयी दिल्ली के दौरे पर जाने की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने की उनकी योजना है। उच्च स्तर के एक सूत्र ने बताया कि इस मुलाकात में वह राज्य के बकाये और बीएसएफ के बढ़ाए गए अधिकार क्षेत्र जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगी। उन्होंने बताया कि बनर्जी 22 नवंबर को राष्ट्रीय राजधानी का दौरा कर सकती हैं और 25 नवंबर को कोलकाता लौटेंगी। सूत्र ने बताया, नयी दिल्ली में अपने तीन दिन के दौरे पर वह प्रधानमंत्री से मुलाकात करेंगी। बनर्जी अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ भी बैठक कर सकती हैं। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जीत का सिलसिला उपचुनावों में भी जारी है। इस कड़ी में अप्रैल-मई में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी द्वारा जीती गई दो सीटों पर भी टीएमसी ने कब्जा कर लिया है। इसी के साथ चारों सीटों पर हुए उपचुनाव में टीएमसी ने जीत दर्ज की है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जीतने वाले उम्मीदवारों को बधाई देते हुए कहा कि परिणाम दिखाते हैं कि बंगाल हमेशा प्रचार और नफरत की राजनीति पर विकास और एकता का चयन करेगा। उनका इशारा भाजपा की तरफ है।
दिनहाटा और शांतिपुर के उपचुनाव को बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई के रूप में देखा गया। कारण, इन दोनों सीटों पर विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जीत दर्ज की थी, लेकिन इन सीटों पर बीजेपी नेताओं ने इस्तीफा दे दिया था। बीजेपी का गढ़ कहे जाने वाले उत्तर बंगाल के कूच बिहार के अंतर्गत आने वाली दिनहाटा सीट से केंद्र में कनिष्ठ गृह मंत्री के रूप में पदभार संभालने के बाद बीजेपी के निसिथ प्रमाणिक ने इस्तीफा दे दिया था। वहीं शांतिपुर सीट बीजेपी सांसद जगन्नाथ सरकार के विधानसभा से इस्तीफा देने के बाद खाली हो गई थी। खरदह वह सीट थी जहां से कोलकाता के पूर्व मेयर सोवनदेब चट्टोपाध्याय चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने ममता बनर्जी के लिए कोलकाता में भवानीपुर सीट छोड़ दी थी, जिन्हें नंदीग्राम से अपनी हार के बाद राज्य चुनाव के छह महीने के भीतर विधानसभा में निर्वाचित होना पड़ा था। इन चारों सीटों पर टीएमसी की जीत के साथ ही राज्य में तृणमूल की 213 सीटों की रिकॉर्ड संख्या और बढ़ जाएगी। वहीं, यह बीजेपी के लिए एक बड़ा झटका है।
ममता बनर्जी इसीलिए गर्म लोहे पर चोट मारना चाहती हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तेल की बढ़ी हुई कीमतों से केंद्र सरकार को हाल में चार लाख करोड़ रुपये की आमदनी होने का दावा करते हुए मांग की कि यह रकम राज्यों में बराबर बांटी जानी चाहिए। ममता ने विधानसभा सत्र के दौरान कहा कि केंद्र सरकार ने पांच राज्यों में आगामी विधासभा चुनाव के मद्देनजर हाल में पेट्रोल और डीजल में दामों पर उत्पाद शुल्क में कटौती की है। मुख्यमंत्री ने कहा, “केंद्र सरकार ने रसोई गैस, पेट्रोल और डीजल पर लगे कर से चार लाख करोड़ रुपये की आमदनी की। अब वे (भाजपा) राज्यों से वैट की दरें कम करने को कह रहे हैं। राज्यों को पैसा कहां से मिलेगा?” उन्होंने कहा, “केंद्र को चार लाख करोड़ रुपये राज्यों में बराबर बांट देना चाहिए।” बनर्जी ने कहा कि तमाम वित्तीय संकट के बावजूद राज्य सरकार विभिन्न प्रकार की सब्सिडी दे रही है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा, “जब चुनाव नजदीक आते हैं, तब वे (केंद्र) कीमतें घटाने लगते हैं। चुनाव हो जाने के बाद वे दाम फिर बढ़ा देते हैं। जो हमें तेल की कीमतों पर प्रवचन दे रहे हैं उन्हें पहले इसका जवाब देना चाहिए कि राज्य सरकारों को पैसा कहां से मिलेगा।” जाहिर है यह ऐसा मामला है जिस पर सभी राज्य सरकारें उनका साथ दे सकती हैं।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में शामिल होने वाली अभिनेत्री श्राबंती चटर्जी ने गुरुवार को पार्टी छोड़ दी। वह राज्य विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के दिग्गज उम्मीदवार पार्थ चटर्जी के खिलाफ मैदान में उतरी थीं, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। अभिनेत्री ने पश्चिम बंगाल के लिए काम करने में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के गंभीर नहीं होने का हवाला देते हुए अपने इस्तीफे की घोषणा की। जोरदार प्रचार के बाद भी राज्य में ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल करने में उनकी विफलता के बाद से ही चटर्जी भाजपा से दूरी बना कर रह रही थीं। चटर्जी ने ट्वीट किया, ‘‘ पिछला चुनाव मैंने जिस पार्टी के टिकट पर लड़ा था, उससे मैं अपना संबंध खत्म कर रही हूं। पश्चिम बंगाल के मुद्दे को आगे बढ़ाने में पार्टी की पहल की कमी मेरे इस फैसले की वजह है। भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई ने अभिनेत्री के पार्टी छोड़ने के निर्णय को ज्यादा तवज्जो नहीं देते हुए दावा किया कि ‘इससे पार्टी पर बमुश्किल कोई फर्क पड़ेगा। भाजपा प्रदेश प्रमुख सुकांत मजूमदार ने कहा, ‘मुझे नहीं पता कि वह चुनाव के बाद पार्टी के साथ थीं भी या नहीं। इसका पार्टी पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
मजूमदार के ही बयान को दोहराते हुए भाजपा नेता तथागत रॉय ने कहा कि यह अच्छा ही हुआ। भाजपा को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली हार के लिए रॉय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर निशाना साधते रहे हैं। रॉय ने वैसे लोगों को पार्टी में शामिल करने की आलोचना की थी, जिनका कोई राजनीतिक आधार नहीं है और खास तौर पर वे मनोरंजन की दुनिया से आते हैं। उन्होंने पार्टी के विश्वसनीय कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करने की भी निंदा की थी। मेघालय और त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल ने कहा, ‘अच्छा ही हुआ कि मुक्ति मिली। मुझे याद नहीं है कि उन्होंने पार्टी में कुछ योगदान भी दिया हो। कभी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की करीबी रहीं चटर्जी इस साल मार्च में भाजपा में शामिल हो गई थीं। वह पार्थ चटर्जी से 50,000 से ज्यादा मतों से हारी थीं। भाजपा नेता भले ही कहते हैं कि इाससे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन गैरभाजपा दलों मे ममता का कद बढ़ रहा है। (हिफी)

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