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मार्तण्ड का मनुहार

मार्तण्ड का मनुहार

   विदा  ले   रहे   मार्तण्ड से,
   सांध्य सुन्दरी  करे मनुहार।
   पल भर   ठहरो   प्रियतम,
   अंजुरी  जल करु सत्कार।।

   सकल जगत जीवन ज्योति
  अजस्त्र   उर्जा   के   स्त्रोत  ।
  जल  बीच   में  लधु    तप
   मेरा   यह   छोटा-सा   व्रत।।
   

   सम्पूर्ण ‌ वैभव के साथ सज,
   अपने  आंचल में  फल ले कर।
   प्रकृति स्वरूपा  खड़ी वामा
   आहृवान  भास्कर  का कर।।

   हजारों  बरसों  से चली  आ,
   रही ,   परम्परा    सनातना।
   भुवन भास्कर को  अर्घ्य  दें,
   करती  सुख वैभव  कामना।।

   नवीन  वस्त्र  सोलह  श्रृंगार,
सूर्यास्त  सूर्योदय पावन बेला,
   अचल  सुहाग सुख सौभाग्य
   अरध्य देती वनिता कर सुपला।।
                       सुषमा सिंह
                            औरंगाबाद
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