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"महाभारत" एक दृष्टिकोण

"महाभारत" एक दृष्टिकोण

भारतीय सभ्यता और संस्कृति तथा संस्कार का दर्पण है महाभारत।यह विश्व का सबसे महानतम ग्रंथ है।इसकी महत्ता का आकलन इसी से किया जा सकता है कि यह न केवल एक विस्तृत इतिहास है अपितु वैदिक धर्म का भी एक धरोहर है।शायद यही कारण है कि इसे" पंचम वेद" की संज्ञा प्रदान की गई।किरातार्जुनीयम्,शिशुपालवधम् एवं नैषधीय चरितम् जैसे संस्कृत के तीन महाकाव्यों का कथानक भी इसी महाकाव्य के क्रोड से उत्पन्न है।कविकुलगुरु कालिदास जैसे विद्वानों ने भी इस महान ग्रंथ को ही अपना आधार बनाया है।भारत के अतिरिक्त पाश्चात्य विद्वानों ने भी इसकी पटकथा पर आधारित अनेक ग्रंथ लिखे। "श्रीमद्भगवद्गीता"जैसे विश्व मान्य ग्रंथ और महान दार्शनिक काव्य का उद्गम भी इसे ही माना गया है।विभिन्न विद्वानों ,चिंतकों के मतानुसार इसे सर्वशास्त्र संग्रह की संज्ञा प्रदान की गई है।
भारतीय साहित्य वाङ्मय के इस गौरवशाली ग्रंथ का सर्जक महर्षि वेदव्यास को माना गया है।इसके विषय में यह प्रचलित है "यन् न भारतम् तन् न भारतम्"।"कृष्णद्वैपायन" के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त महर्षि वेद व्यास के द्वारा न केवल महाभारत अपितु चतुर्वेदों,अष्टादश पुराणों,एवं "ब्रह्मसूत्र"जैसे महान ग्रंथों का भी सृजन किया गया।विद्वानों की ऐसी मान्यता है कि महर्षि वेद व्यास के द्वारा महाभारत जैसे विशाल ग्रंथ के सृजन का उद्देश्य वेदों के आशय को समझाना था।यही कारण रहा कि इसे वैदिक वाङ्मय में सर्वोपरि स्थान दिया गया।इसके अंतर्गत वेदों के अतिरिक्त उपनिषद, दर्शन,पुराण, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, मोक्षशास्त्रादि जैसे विषयों का भी इसमें समावेश है।प्रसंगानुसार एक बात सामने आती है कि एक बार देवताओं के द्वारा इसकी महानता सिद्ध करने के लिये परीक्षण के क्रम में वेदों को तराजू के एक पलड़े पर तथा दूसरे पलड़े पर महाभारत को रखा गया।अपने गुरुत्व ,घनत्व और महत्व के कारण यह भारी रहा।इसी कारणवश इसे महाभारत अभिधान दिया गया।
"महत्वात् भारवत्वात् च महाभारत उच्यते"।(आदि पर्व १/२७४)।इसके अतिरिक्त भरतवंशी क्षत्रिय राजाओं का इतिहास होने के कारण भी इसे "महाभारत"नाम से अभिहित किया गया।"भरतानाम् महज्जन्म महाभारत तमुच्यते"।(आदि पर्व ६२/३९)।
यह न सिर्फ एक महाकाव्य है अपितु एक ऐसा महासागर है जिसका थाह पाना बड़ा ही कठिन है।यही एकमात्र ऐसा महाकाव्य है जिसके अंदर काव्य के विभिन्न विधाओं का समावेश है।महर्षि ने आदि पर्व(९३)में स्वयम् श्रीमुख से इसकी स्वीकृति प्रदान की है।वेद व्यास कहते हैं कि इसके अंतर्गत वेदों के रहस्य विस्तार से लेकर इतिहास, पुराणों,चातुर्वर्ण्य धर्म,पुराणाशयों,ग्रह,नक्षत्र,तारा,आदि का भी प्रमाण समाहित है।इसके अतिरिक्त न्याय,शिक्षा,चिकित्सा, दान,पाशुपतास्त्र, पुण्यमयी तीर्थों,देशों,नदियों, पर्वतों, वनों,एवं सागरों को भी वर्णित किया गया है।अतेव यह कहना युक्तिसंगत प्रतीत होता है कि यह सृष्टि के समग्र पहलुओं को अपने आपमें समेटे एक अद्भुत विशालकाय ग्रंथ है।इस धरातल पर ऐसा कोई भी कथा प्रसंग नहीं जो जिसका समावेश महाभारत में न हो।कुल १९२३ अध्यायों में लगभग १००,००० (एक लाख)श्लोकों को अपने आपमें आत्मसात कर विश्व के महानतम ग्रंथों की श्रेणी में अद्यतन अग्रिम पंक्ति में दृष्टिगोचर होता है "महाभारत"।आदिपर्व के कथावलोकन से स्पष्ट होता है कि महर्षि वेद व्यास के द्वारा प्रणीत यह महानतम ग्रंथ जिसे स्वयम् गणाध्यक्ष के द्वारा लिपिबद्ध किया गया जिसमें तीन वर्ष की कालावधि का व्यय हुआ।चार संस्करणों में रचित इस महाकाव्य के प्रथम संस्करण में तीन लाख श्लोक जिसे देवर्षि नारद के द्वारा देवलोक में देवताओं के समक्ष वाचन किया गया।द्वितीय संस्करण में पंद्रह लाख श्लोक जिसे देवलक असित के द्वारा पितृलोक में वाचन करते हुये पितरों को सुनाया गया।तृतीय संस्करण में चौदह लाख श्लोक जिसे महामुनि शुकदेव के द्वारा गंधर्व,यक्ष,एवं राक्षसों को श्रवण कराया गया।चतुर्थ एवं अंतिम संस्करण मृत्युलोक के लिये जिसमें कुल श्लोक संख्या एक लाख जिसे महर्षि वैशम्पायन के द्वारा जनमेजय एवं अन्य ऋषियों के मध्य वाचन किया गया।आगे चलकर जनमेजय के द्वारा इसे सौती उग्रश्रवा को सुनाया गया,उस काल खंड में इसके १००(एक सौ)पर्व होने का प्रमाण मिलता है।
महाभारत की महिमा के क्रम में यह स्पष्ट कहा गया है कि नित्य प्रातः शायं इसके अध्ययन से जीव समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।उसे फिर तीर्थराज पुष्कर में भी स्नान करने की आवश्यकता नहीं।(आदि पर्व २/३९२/३९५)।वैसे तो सम्पूर्ण महाभारत ही सेवनीय है किन्तु "भीष्म पर्व'के अंतर्गत योगीराज कृष्ण के द्वारा विश्व के महान धनुर्धर अर्जुन के मोहभंग हेतु दिये गये उपदेश जो "श्रीमद्भगवद्गीता"के नाम से विश्वविश्रुत है वह सिर्फ सेवनीय ही नहीं आत्मसात करने योग्य है।यह सम्पूर्ण शास्त्रों का सार है।इसमें ही महाभारत जैसे महान ग्रंथ का उद्देश्य निहित है।यह शाश्वत था,आज है और भविष्य में भी रहेगा।इसमें ही बताया गया है ...युद्ध करो लेकिन धर्म के हितार्थ,कर्म करो पर निष्काम।इन्हीं दो महामंत्रों ने इसकी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रखा है।अंत में यह कहना अत्यंत समीचीन प्रतीत होता है कि जब तक इस धराधाम पर "महाभारत"जैसी भारतीय संस्कृति की स्रोतस्विनी प्रवाहित होती रहेगी हमारी विरासत को कोई आँख नहीं दिखा सकता।इस कस्तूरी की महक से दिग्दिगन्त सुवासित होता रहेगा।
"वसुदेव सुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकी परमानंदम् कृष्णंवंदेजगद्गुरुम्।।".......मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।
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