पुरस्कार बाँटा था
हिन्दी फिन्दी हो गयी,
आओ,अंगरेजी बोलें।
अपने मन के भावों को
अब मुक्त भाव से खोलें।
नामुराद हिन्दी ने मुँह पर
ताला जड़ा हुआ था।
मन-ही-मन देता था गाली,
मंच पे जब खड़ा हुआ था।
करता क्या, कवियों की उल्टी-
सीधी भी सुननी थी।
एक कवयित्री ने सच मानो,
तंग साड़ी पहनी थी।
देख देखकर उसी को मैंने
दिन उस दिन काटा था।
हाँ, अच्छा कुछ लगा जब मैंने
पुरस्कार बाँटा था।
-मिथिलेश कुमार मिश्र 'दर्द'
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