लौटा स्थान
--:भारतका एक ब्राह्मण.
संजय कुमार मिश्र "अणु"
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सजाकर होठों पर मुस्कान,
कहे की स्वागत है श्रीमान।
फिर वे ऐसा किये व्यहवार-
कि जैसे ना कोई पहचान।।
फिर चुराकर मुझसे नजरें,,
सब को लगे दिखाने नखरें।
यहां पर ऐसा जो कर देता-
तो होता नव नूतन की खान।।
है कहाँ पर माला चादर,
यहीं तो रखा था लाकर।
अब बचा नहीं है समय-
रखा कर इस पर ध्यान।।
मै कर के आया तैयारी,
कि कब आए मेरी बारी।
लेकिन था वह बेफिक्र-
बना मेरी तरफ अंजान।।
मुझे हुई ऐसी अनुभूति,
इसकी सारी बाते झूठी।
यहां आयेगें ऐसे लोग-
जोकि होगें अमर समान।।
हुई ऐसी हीं प्रभु की माया,
कोई कहकर भी न आया।
हुआ किसी तरह प्रारंभ-
न कोई स्तुति स्वागत गान।।
देख मेरा मन हुआ उदास,
ये कैसा मेरा खासमखास।
देकर अपनी रचना भेंट-
भारी मन से लौटा स्थान।।
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वलिदाद,अरवल(बिहार)804402.
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