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गांव के परिवेश के दर्शन,

गांव के परिवेश के दर्शन,

गांव के परिवेश के दर्शन,
ढिबरी का उजियारा और आंगन,
कविता या पेन्टिंग में ही मिलते हैं।

खेत, खलिहान बैल और किसान,
गलियों में दादा, दादी के पैरों के निशान,
सांझ वृन्दा पर मिट्टी के दिये जलते हैं।

माना के मद्धम हैं रोजगार-धंधा,
लेकिन इंसानियत अभी भी हैं वहाँ जिंदा,
आधी रात आपके लिये दरवाजे खुले मिलते हैं।

शहर की बेइमानी के प्रदूषण में,
ब्यूटी पार्लर के काल्पनिक आभूषण में,
जानेमाने चेहरे अजनबी लगते हैं।

सांझ मुहाल के चोपाल में,
खलिहान, खेत या तलैया ताल में,
अजनबी भी अपने लगते हैं।

खटिया में जब भी सोता हूँ,
दालान में साथ खाना खाता हूँ,
तब सपने भी सपने लगते हैं।


राजेश लखेरा, जबलपुर।
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