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खुशियां पुरजोर मांगी थी रब से

खुशियां पुरजोर मांगी थी रब से

खुशियां पुरजोर मांगी थी रब से,
गरीबी में पैदा हुआ था जब से।

ना सुना वक्त ने, ना रहम की खुदा ने,
मैं लड़ता, मिटता रहा, खुदा के कहर से।

पसीना बिकता रहा, दर्द बढ़ता रहा,
आंसू हाल पूछता रहा अपने ही जख्म से।

जिसकी लाठी भैंस उसी की.नजर आई,
मैं रोता रहा ईल्म से वो हंसता रहा जुर्म से।

समाचार बनता रहा अखबार का, बाजार का,
और तमाशा बना कहीं इधर से, कहीं उधर से।

मेरे गांव के दरवाजे बंद नहीं थे अभी तक ,
वापिस चल पड़ा हूँ उल्टे पैर आज तेरे शहर से।

कोरोना से मिलनेवाली मौत से पहले,
मर ना जाऊं कहीं भूख की तड़प से, कसम से।

राजेश कुमार लखेरा, जबलपुर।
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