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हिंदी कहाँ हो तुम कहाँ हैं हम

हिंदी कहाँ हो तुम कहाँ हैं हम 

आशीष पाण्डेय 
अभी उत्तर प्रदेश में लोकसेवा आयोग के परिणाम आये तो हिंदी माध्यम के परीक्षार्थी नगण्य थे लोक सेवा आयोग की बाते तो आकाश कुसुम है। इसका सीधा सा उत्तर है की हिंदी और संस्कृत के जो भी विद्वान हैं वे अपने भावी पीढ़ियों को मातृ भाषा (हिंदी और संस्कृत) में शिक्षित करना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं और कालांतर में वहीलोग विभिन्न संचार माध्यमों में यूपीएसी जिहाद का बकैती करते हुए रोना रोते हैं । कृषि का नियम है की बीज सरक्षित ही नहीं करोगे तो अगले साल अनाज कहाँ से पावोगे और हमारी तो यह हाल है की  गोदाम में चूहे पालकर बोरे सलामत हों ऐसी अपेक्षा कर रहे हैं।

हिंदी भाषा आज के समय मज़ाक का  विषय बनते जा रहा है। आज के समय अंग्रेजी को ज़ादा महत्व दिया जा रहा है। आज के समय में किसी विद्यार्थी से हिंदी की वर्णमाला सुनाने को कहा जाए तो ९० प्रतिशत लोग इसमें असफल रहेंगे, वहीं अंग्रेजी की वर्णमाला शायद ही किसी पढ़ने वाले विद्यार्थी से न बने।

आज के समय हिंदी विश्व की पांच सबसे प्रसिद्ध भाषाओ में से एक है । एक तरह से समझा जाए तो हिंदी हमारे दिल की भाषा है और आज अंग्रेजी पेट की भाषा है। आज देश में हिंदी और अंग्रेजी की लड़ाई में हिंदी हारती जा रही है। देश में हिंदी बोलने वालों को महत्व नहीं दिया जा रहा है । हिंदी ही एक मात्र भाषा है जिसमे इंसान अपनी अनुभूति, अभिव्यक्ति पूर्ण रूप से ज़ाहिर कर सकता है अन्यथा ये किसी और भाषा में पूर्ण रूप से नहीं पाया जाता।

हिंदी का सबसे बड़ा महत्व ये है की इस भाषा में त्रुटि बिल्कुल  भी नहीं है। ये जैसे बोली जाती है वैसे ही सोची और समझी जाती है। भारत की हिंदी फिल्मे पूरी दुनिया में देखि और पसंद की जाती है और भारत का संगीत जो की हिंदी भाषा से निर्मित  सबसे ज़ादा गाया और बजाया जाता है। भारत की हिंदी फिल्मों का देश के लोगों पे ज़बरदस्त प्रभाव होता है और ये भारत के बहार भी अपनी छाप छोड़ती है। दुनिया में सबसे ज़ादा गाने हिंदी भाषा में बने है ।

किसी भी देश की भाषा उसकी उनती का मार्ग होती है और भारत में हिंदी ने सबसे अहम् भूमिका निभाई है। हिंदी भाषा ही एक भाषा है जिसने पुरे देश को एकता के बंधन में बांध के रखा है। हमारे देश के संविधान में हिंदी को देश की संघ भाषा का दर्जा दिया गया है । आज पूरे विश्व में तकरीबन १३० देशो में हिंदी भाषा का अध्यन होता है।

आज के समय कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से शुद्ध हिंदी में वार्तालाप नहीं करता। यह एक गंभीर विषय है जिसे समय रहते इसका समाधान ढूँढना बहुत आवश्यक है । भारत देश के विश्वप्रसिद्ध नेताओं ने हिंदी का महत्व बखूबी समझा और उसे बहुत सम्मान दिया है जैसे स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी, लाल बहादुर शास्त्री, राजीव गाँधी इत्यादि।

श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने एक बार संयुक्त राष्ट्र की बैठक में हिंदी में इतना प्रभावशाली भाषण दिया था जिसको विश्व में सभी सुनने वाले लोग स्तब्ध रह गए थे । वर्तमान में भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने हिंदी का महत्त्व दुनिया को बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी, उनके भाषण हमेशा हिंदी में रहते है चाहे वो कोई भी राज्य या देश में जाए। हिंदी भाषा इतनी प्रभावशाली है की आज दूर देश से लोग हिंदी  पढ़ने भारत आते है।

पिछले कुछ वर्षो में हिंदी का विस्तार काफी बढ़ा है जिसमे आधुनिक प्रौद्योगिकी का बहुत बड़ा योगदान है पर फिर भी हिंदी का स्तार उस स्थान पर नहीं है जहाँ उससे होना चाहिए, इसके लिए हमे अपनी शिक्षा व्यवस्था में काफी सुधर करने पड़ेंगे, वैसे भी हमारे देश की शिक्षा प्रणाली एक दम निचले सत्तर पे है।

भारत में हिंदी के लेखकों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है जिसमे कई प्रसिद्ध लेखक,कवी,गीतकार और साहित्यकार को आज भी उनके कार्य के लिए हमेशा याद किया जाता है जिसमे कालिदास, आर्यभट,कबीर, मुंशी प्रेम चाँद, हरिवंश राइ बच्चन, आनंद बक्शी, समीर अनजान, गुलज़ार, जावेद अख्तर, रविंद्र जैन , ये सब वो नाम है जिनकी तारीफ़ के लिए हिंदी के सभी शब्द कम पड़ जाए। हिंदी के गीतकार समीर को २०१५ में तकरीबन ३५२४ हिंदी गीत लिखने पे गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड से सम्मानित किया गया।


ये सभी बातें हिंदी की महानता को दर्शाती है। तारीख १४ सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में बहुत धूम-धाम से हर जगह मनाया जाता है, क्योंकि इस दिन १९४९ में, भारत की संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में गणराज्य भारत  की आधिकारिक भाषा के रूप में लिखी हिंदी को अपनाया था

गैर-हिन्दीभाषी भी हिंदी सीखने के लिए कितने उत्साहित हैं और हिंदीभाषी कई लोग ऐसे मिलेंगे जहाँ अगर आप अंग्रेजी में बात न करो तो आपको हिंदी बोलने से लोग लगभग अनपढ़ के ही समकक्ष रखेंगे।

हम ने भी कई लोगों को सुना है शान से कहते हुए कि हमें तो ढंग से हिंदी आती ही नहीं क्योंकि कभी ढंग से सीखी ही नहीं। समाज पर अंग्रेजी का इतना प्रभाव है कि लोग और कुछ नहीं तो कम से कम हाथ में अंग्रेजी किताब ही पकड़ कर चलना चाहते हैं। उनके लिए यह प्रगतिशील होने की निशानी है शायद उनको लगता है हिन्दी की किताब हाथ में होगी तो जैसे मान सम्मान में बट्टा लग जाएगा।

अब अगर लिखने की बात करें तो हम  हिंदी में लिखते हैं  कहानी-कवितायेँ तो सुनने में बहुतों को अच्छा नहीं लगेगा मतलब कि प्रतिक्रिया ही ऐसी होगी "क्या हिंदी में लिख रहे हो? अरे अंग्रेजी में लिखा करो, अंग्रेजी की मांग ज्यादा है"। अब ये क्या बात हुई हमारी तो समझ में बिलकुल नहीं आती। कई लोग ऐसे भी मिले जिन्होंने ये भी कह दिया कि "चलो ठीक है खाली बैठने से तो हिंदी में लिखना ही ठीक है", मानो हिंदी में लिखने की कोई कीमत ही नहीं? अरे भई हम हिंदी में लिखते हैं  क्योंकि मुझे ये पसंद है ऐसे मेंं ये सब बातें सर के ऊपर से जाती हैं।

अच्छा समस्या ये है कि लिख भी लो आप हिंदी में तो छपवाओगे कहाँ ? क्योंकि कोई भी प्रकाशक बाजार के अनुसार ही काम करता है। हिन्दी बोलने वालों में ही हिन्दी किताबों को पढ़ने-खरीदने की भूख नहीं दिखती। आप हिंदी की किताबे खरीदते हैं तो बुद्धिजीवी वाली भावना शायद आती ही नहीं लोगों में।

अगर हम  किसी से कहें  कि मुझे तो प्रेमचंद जी और जयशंकर प्रसाद जी की रचनाएँ पढ़नी बेहद पसंद हैं तो शायद लोग मुझे पता नहीं कौन से युग का समझ लेंगे।

और हिन्दी और अंग्रेजी किताबों का बाजार भी अलग-अलग मानसिकता के आधार पर काम करता है। जो किताब अंग्रेजी में १५०  रुपये की बिकती है वही हिन्दी में बेचने के लिए उसकी कीमत ५० -६०  रुपये रखनी पड़ती है। लोग हिन्दी की किताबों पर पैसे नहीं खर्च करना चाहते और कोई भी प्रकाशक अपने लिए मुश्किलें क्यों पैदा करेगा? यह हिंदी भाषी लोगों के लिए दुर्भाग्य की ही बात है कि हिन्दी भाषा को लेकर उसे आगे बढ़ाने,पढ़ने, बोलने की खुद हिंदी-भाषियों में ही आकांक्षा नहीं है।

वैसे अगर कोशिश की जाए तो हिन्दी भाषा की खोई लोकप्रियता वापस पाई जा सकती है पर ये किसी एक के करने से नहीं होगा और सम्मिलित प्रयास से ही हम सफल हो सकेंगे । इस समय सोशल मीडिया सबसे बड़ी ताकत है और हम देख सकते हैं कि कुछ साइट्स जैसे मौम्सप्रैसो और कुछ अन्य साइट्स भी हिंदी लेखन और पठन की दिशा में बहुत ही सराहनीय प्रयास कर रही हैं । ये संस्थाएं न केवल नए लेखकों को अवसर प्रदान कर रही हैं पाठकों तक अपनी बात पहुँचाने का बल्कि एक ऐसा मंच प्रदान कर रही हैं जो तुरंत और आसानी से बेहतर हिंदी साहित्य और अन्य पठनीय सामग्री को लाखों लोगों तक पहुंचा रही हैं इनके जरिए लोगों को हिन्दी भाषा के महत्व का एहसास कराया जा सकता है और इन्ही साइट्स में आप देख सकते हैं कि ऑनलाइन हिंदी साहित्य पढ़ने वालों की संख्या बेहद तेजी से बढ़ रही है ये गर्व मिश्रित ख़ुशी के पल हैं और ये आप पाठकों के कमैंट्स में पढ़ सकते हैं जिसमे वो हिंदी पढ़ने के प्रति प्रेम और सहजता को प्रकट करते हैं। इससे हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार लोगों में बढ़ा है जो एक आशा की किरण जगाती है कि हिंदी भाषा अपने उच्च स्तर एवं स्थान को वापस पा सकेगी।

देश को जरूरत है ऐसे हिन्दी लेखकों की, जो प्रगतिशील हों, किताबें छपवाने में तो दिक्कतें आएंगी, लेकिन वो भी ठान लें लिखना तो सिर्फ हिन्दी में ही है। हमें ऐसी जुझारू मानसिकता वाले लेखकों को बढ़ावा देना है। जिस संबंध में फिलोसॉफिकल रिसर्च कौंसिल अपने लघुत्तम संसाधनों से महत्तम आप सभी के सहयोग से देने को कृत संकल्पित है। 

इस मामले में सरकार की दखलंदाजी के साथ हिन्दी भाषा की मार्केटिंग की भी जरूरत है। जब तक खुद देशवासी और खासकर के हिंदी-भाषी अपनी मातृभाषा का सम्मान नहीं करेंगे, हिन्दी का सम्मान वापस लाना कठिन है पर ये उतना नामुमकिन भी नहीं है और इसमें हम सोशल मीडिया की सहायता भरपूर ले सकते हैं और सबसे पहले स्वयं में से ही इस भावना को निकाल फेंकना होगा कि हिंदी बोलने-पढ़ने-लिखने से हम कमतर या छोटे हो जाते हैं ।

ये हमारी मातृभाषा है और इसका सम्मान बेहद जरूरी है । सम्मान करें और दूसरों को भी सिखाएं अपना पक्ष मजबूती से रखें ,समझाएं ,एक दिन नहीं बल्कि हर दिन और हमेशा हिंदी का सम्मान करें।

वैसे सभी लोग ऐसे नहीं हैं कि जो अपनी मातृभाषा हिंदी बोलने-पढ़ने के प्रति हीनता महसूस करते हों वरन उस पर गर्व करने वाले भी बहुतायत में हैं पर जो हीनता और शर्म महसूस करते हैं उन्हें उनके खोल से बाहर निकालना बहुत जरूरी है अपनी मातृभाषा,अपनी प्यारी सरल हिंदी बोलने में क्या शर्म और हीनता महसूस करना ? हिंदी हैं हम....कहिये गर्व से....अपनी स्वयं की भाषा का स्तर और उसे उसका उच्च स्थान वापस दिलाना हमारा कर्त्तव्य है चलो उसे निभाएं, राष्ट्रभाषा का सम्मान करें और अन्य सभी को भी इसके लिए प्रेरित करें।

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