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मंदसौर की सुंदर सूर्य प्रतिमा

सौर दर्शन की व्यापकता

मंदसौर की सुंदर सूर्य प्रतिमा

•श्रीकृष्ण "जुगनू"
मंदसौर ( मध्य प्रदेश) के पास कुछ महीनों पहले मिली सूर्य प्रतिमा अपनी बनावट, तक्ष unण और तारकारी के लिए किसी कौतुक से कम नहीं। यह मंदसौर से 28 किलोमीटर गांव अफजलपुर के खेत में मिली है और पांच फीट ऊंची, स्वतंत्र मूर्ति होने से कभी किसी मन्दिर में मुख्य पूजा प्रतिमा रही होगी, ऐसा सहज विश्वास होता है। रचना और रूप में यह पाषाण प्रतिमा 9वीं सदी के बाद की नहीं हो सकती है, यह 7-8वीं सदी की संभव है।

मंदसौर निवासी मित्र, डॉ. रमेश कनेसरिया जी ने इस मूर्ति के चित्र और सूचना भेजकर आग्रह किया कि मैं कुछ लिखूं। कुछ विलम्ब तो हुआ लेकिन कौतुक अब भी बना हुआ है कि ऐसी मूर्ति रचना अपनी सर्वांग कला का उदाहरण है और मूर्ति शास्त्र में जो प्रमाण हैं, यह उनका प्रतिनिधित्व करती हैं। काश्यप शिल्प, बृहत संहिता, सांब पुराण, भविष्य पुराण, देवता मूर्ति प्रकरण आदि में यह रूप वर्णित है। सूर्य की प्रतिमा के निर्माण में निम्न चिह्न और प्रतीक आदि रखे जाते हैं और लगभग पांच सौ साल तक उन नियमों का शिल्पकारों में पालन हुआ जब तक कि सूर्य को केवल नवग्रह के तहत विलीन नहीं मान लिया गया :

• स्कंध की ऊंचाई पर उभयपार्श्व में खिले पद्म एवं आनन के चारों ओर कीर्तिमंडल की रचना।
• अंधकार के निवारण के लिए धनुष - बाण लिए बायीं ओर देवी प्रत्यूषा एवं तथा दायीं ओर देवी उषा का अंकन।
• बाएं अश्विनीकुमार, दंड धारण किए द्वारपाल दंडी व बगल में निक्षुभा देवी
• दायीं ओर पुन: अश्विनी कुमार और कलम - दवात हाथ में लिए द्वारपाल पिंगल तथा रजनी देवी
• पांव में ‘जूते’ पहने भारतीय देवताओं में सूर्य को ही दिखाया जाता है। दक्षिण में बिना बूट वाली मूर्तियां भी मिली हैं।

यह भी याद रखना चाहिए कि वैसे सूर्य की मूर्ति में सबसे नीचे ‘अधिष्ठान’ पर 7 घोड़े , एक चक्र वाला रथ, सारथि अरुण अथवा ‘महाश्वेता देवी’ को बनाया जाता है। चंद्रार्क हरिहरपितामह में मिला जुला रूप होता है। ( भारतीय प्रतिमा शास्त्र : डॉ. अनुभूति)

मालवा का दसौर कभी सौर पूजा का केंद्र रहा। शिवना, चम्बल, गंभीरी जैसी नदियों के बीच, कर्क रेखा के उत्तरी सिरे पर स्थित दसौर के पास ही मढ़ (मठ) था, यही कारण है कि दोनों को मिलाकर मंदसौर कहा जाने लगा। यह कभी इतना खास था कि अनेक समाज वाले अपनी अटक लिखते : दसोरा। ब्राह्मण, लोहार, सालवी आदि में दसोरा अटक अभी भी लगती है। इन सब में श्रेणी व्यवस्था भी है। मैत्रक, मालव, औलीकर जैसे वंशों का यहां से संबंध रहा और इनसे अधिक महत्व उन रेशम शिल्पियों का रहा जो गुजरात से यहां आए और जिन्होंने सूर्य मंदिर बनवाया। एक सदी तक यह समुदाय विकास करता रहा। इसी कारण जब मन्दिर जीर्ण हो गया तो उसका जीर्णोद्धार भी करवाया। बात पांचवीं सदी की है। 

यहां सौर मत के विकास के और भी कुछ कारण हैं। जहां जहां समय में फर्क पड़ता, वहां वहां भी सूर्य मंदिर बने। इनमें खोर, कुकडेश्वर, चित्रकूट ( चित्तौड़), गंगरार, बंबावदा जोगणिया, मंदेसर, नंदेसमा, पलासमा, रणकपुर और आबू आदि में सूर्य मन्दिर 10 वीं सदी तक बनते रहे। ( मेवाड़ का प्रारम्भिक इतिहास, सन वर्शिप इन अंशिएंट इंडिया)

मंदसौर से लगभग 28 किलोमीटर दूर अफजल पुर गाँव में इसको ग्रामीणों ने विराजमान किया है। सूर्यनारायण की यह सपरिवार, सपरिकर प्रतिमा है। ये प्रतिमा खेत में से मिली थी। भारत में इतनी भव्य 5 फीट ऊँची प्रतिमा दुर्लभ ही है। स्थानक, कमल चक्र आदि आयुध, कवच, उपानह वाले सूर्य के उभय पार्श्व में उषा, संध्या, प्रत्यूष और ऊपर अन्य रूपों वाली अखंड प्रतिमा बहुत आकर्षक है। यह प्रतिमा देखकर एक बार विष्णु प्रतिमा की याद भी आती है। किरीट मुकुट, वनमाला, पीताम्बर आदि समान मिलते हैं। 
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