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इस्लाम के प्रारंभिक 100 वर्ष-प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

इस्लाम के प्रारंभिक 100 वर्ष

-प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
610 ईस्वी में मुहम्मद साहब को पहली आयाः उतरी, जिससे वे स्वयं भयभीत होकर कांपते हुए घर पहुंचे। जहाँ स्नेहमयी खदीजा ने ढाढ़स बंधाया कि जिन जिब्राईल को हमारे पूर्वज सदा से पवित्र फरिश्ते के रूप में याद करते आए हैं, जिन्होंने अब्राहम और इस्माइल को प्रेरणा देकर पवित्र काबा में अल्लाह का घर बनवाया था और परिसर में 364 देवियों-देवताओं की मूर्तियां स्थापित कराई थीं, जिनकी पूजा हमारे पूर्वज निरंतर करते आए हैं, वे ही देवदूत जिब्राईल आपको दर्शन देकर अल्लाह का दिव्य संकेत देने आए थे। यह आश्वासन देकर उन्हें लिटाकर कम्बल उढ़ा दिया और सेवा की।
तब तक मुहम्मद साहब के रूकय्या, कुलथुम और फातिमा ये तीन बेटियां हो चुकी थीं। उमर की बेटी हफ्सा भी हो चुकी थी। काबा के पवित्र मंदिर की मरम्मत भी 605 ईस्वी में मुहम्मद साहब करा चुके थे। तब तक उन्हें पूर्वजों के धर्म पर अटल श्रद्धा थी।
610 ईस्वी से जो आयतें उतरनी शुरू हुईं, तो एक वर्ष बाद ही अपने ही कुरैश कबीले से उनकी लड़ाई होने लगी। 614 ईस्वी में तो भयंकर लड़ाई हुई। 616 में और उग्र विरोध हुआ। 617 ईस्वी में कुरैशों ने मुहम्मद साहब के खानदान का बहिष्कार कर दिया। तब से मुहम्मद साहब के साथियों के सर पर खतरा मंडराने लगा। अंततः 622 ईस्वी में उन्हें अबू बकर आदि चुने हुए साथियों के साथ छिपकर भागकर मदीना जाना पड़ा। तभी से हिजरी संतत का प्रारम्भ माना जाता है। अगले 10 वर्ष उन्हें मुख्यतः मदीना में ही बिताने पड़े और वहीं उनका निधन हुआ। एक दिन भी वे शांत नहीं बैठे।
इस बीच 624 और 625 ईस्वी में उन्होंने यहूदियों के 2 कबीलों से भी लड़ाइयां लड़ी-बनी कैनका और बनू नादिर से। बद्र और उहुद की ये लड़ाइयां मुख्यतः यहूदियों से हुईं। साथ ही, मक्का के बहुदेववादी बंधु-बांधवों से भी लगातार लड़ाई चली। 22 वर्षीय बेटी रूकय्या की मृत्यु हो गई और अगले वर्ष 625 ईस्वी में अली के बेटे हसन का जन्म हुआ जो मुहम्मद साहब का पोता था। उसी वर्ष मुहम्मद साहब ने 11 वर्षीया आयशा से विवाह किया। तब उनकी उम्र आयशा से लगभग पांच गुनी थी। उससे अगले वर्ष अली के दूसरे बेटे (मुहम्मद साहब के दूसरे पोते) हुसैन का जन्म हुआ।
627 ईस्वी में अरब के एक कबीले बनी कुरैजा ने मुसलमानों पर आक्रमण किया। अगले वर्ष खैर की लड़ाई हुई।
उससे अगले वर्ष बहुदेववादियों को सबक सिखाने मुहम्मद साहब ने अपनी जन्मभूमि और मातृभूमि -पितृभूमि मक्का पर चढ़ाई की, जिसमें बड़ी सूझबूझ से रणनैतिक युद्ध किया। 630 ईस्वी में मदीने से 10,000 लोगों को लेकर फिर मक्का पर चढ़ाई की और मक्का वालों ने डरकर संधि कर ली। क्योंकि मक्का की कुल जनसंख्या 2,000 ही थी।
उसी वर्ष बेटी कुलथुम की मृत्यु हो गई व अगले वर्ष बेटे की मृत्यु हो गई। साथ ही अरब के शफीक कबीले की लड़ाई मुसलमानों से हुई। 632 ईस्वी में मक्का से सभी परम्परागत धर्मनिष्ठ अरबों का अधिकार समाप्त कर उस पर केवल मुसलमानों का अधिकार बलपूर्वक घोषित किया गया और उसी वर्ष मुहम्मद साहब की अचानक मृत्यु हो गई, जब कि वे कुछ ही दिनों पहले युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे और 61 वर्ष के ही हुए थे। एकमात्र जीवित वारिस बेटी फातिमा भी उसी वर्ष मर गई।
बेटी को जो जमीन मुहम्मद साहब ने देने की घोषणा स्वयं की थी, उसे पहले खलीफा अबूबकर ने नहीं दिया। फिर तो लड़ाइयों का अनंत सिलसिला ही चल पड़ा। स्वयं अबू बकर को खलीफा बनाए जाने को लेकर लड़ाई हुई। 2 वर्ष बाद बकर मर गए। तब उमर खलीफा बने। उन्होंने शाम देश की राजधानी दमिश्क पर चढ़ाई की। वहां जीते तो पर वहां के शासकों से सदा के लिए बैर हो गया। 636 ईस्वी में उमर ने भारत में महाराष्ट्र के थाने पर नाविकों को लूटने भेजा, जिन्हें मराठों ने मार डाला। तब से वे सीरिया और इजिप्ट की ओर बढ़ने लगे। जब थोड़ी शक्ति बढ़ी तो पारसीकों से युद्ध शुरू कर दिया। 644 ईस्वी में पारसीक युवक फिरोज नौचंदी ने उमर की हत्या कर दी। नए खलीफा उस्मान की सेना ने भारत के खुरासान पर आक्रमण किया और बुरी तरह मार खाई। तब तक खलीफा पद अरबों से पहले शाम देश वालों ने छीन लिया था। फिर उनसे तुर्कों ने छीन लिया।
तुर्कों ने 648 ईस्वी में ईसाइयों से लड़ाइयां शुरू कर दीं। फिर तुर्कों से अरबों की भी लड़ाई होने लगी। जबकि दोनों मुसलमान थे। तुर्क जीते। लड़ाईयां चलती रहीं और 656 ईस्वी में उस्मान की हत्या एक मिश्रवासी तुर्क ने कर दी।
तब अली चौथे खलीफा बने। शिया उन्हें पहला इमाम कहते हैं। उधर सीरिया के मुआतिमा ने स्वयं को खलीफा घोषित कर दिया और 661 ईस्वी में एक तुर्क ने अली की छल से हत्या कर दी। अली की हत्या के बाद हसन को शियाओं ने इमाम बनाया। कुछ समय बाद हसन की बीबी ने ही हसन को जहर देकर मार डाला। तब हुसैन इमाम हुए। परंतु सीरियाई तुर्क यजीद ने हुसैन को धोखे से घेरकर करबला में सपरिवार मरवा डाला।
हुसैन को सपरिवार करबला के मैदान में तड़पा-तड़पा कर यजीद ने मारा। क्रूरता, नीचता, हिंसा और घृणा की पराकाष्ठा यजीद ने दिखाई। बर्बर अमानवीयता का व्यवहार किया। तब हुसैन का बेटा इमाम बना। इस तरह शिया-सुन्नी खूनी संघर्ष चलता रहा। तीन वर्ष बाद यजीद भी मर गया। तब 684 ईस्वी में दो लोगों ने एक साथ स्वयं को खलीफा घोषित कर दिया। मक्का के अब्दुल्ला इब्न जुबैर ने स्वयं को खलीफा घोषित किया और शाम देश में दमिश्क में मारवान प्रथम ने स्वयं को खलीफा घोषित किया। इसके बाद अंतहीन आपसी रक्तरंजित लड़ाइयों में मुसलमान डूब गए। मारवान प्रथम की मृत्यु 685 ईस्वी में हुई तो पुनः दो लोगों ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया- अबुल मजीद ने और अल मुख्तार ने। दोनों के बीच 687 ईस्वी में कूफा में भयंकर लड़ाइयां हुईं। मुख्तार मार डाला गया। चार वर्ष बाद अब्दुल मजीद की भी हत्या हो गई। मुवैया द्वितीय खलीफा बने जिन्होंने सीरिया की उदार परम्परा को कायम रखा, जिससे बहुत से यहूदी और बहुदेववादी मुवैया द्वितीय के साथ आ गए और ईसाई नरेश जस्टीनियन द्वितीय इस लड़ाई में उनसे हार गए। अल-वालिद के बाद सुलेमान इब्द अब्दुल मलिक को खलीफा बनाया गया। उनके बाद यजीद द्वितीय खलीफा बना। इस तरह प्रथम 100 वर्षाें में एक दिन भी मुसलमान आपस में शांति और सद्भाव से नहीं रहे। निरंतर मारकाट, खून खराबा, छल, विश्वासघात, वंचना, वचनभंग का क्रम चलता रहा। कबीलों की लड़ाई में कुछ मर्यादाएं थीं। मजहबी आपसी लड़ाइयों में वे मर्यादाएं भी नहीं बची। सब कुछ भद्दा, कुरूप, वीभत्स और शर्मनाक। प्रेम, शांति, भाईचारा दूर-दूर तक नहीं दिखा।
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