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जगा चिंगारी!

जगा चिंगारी!

        संजय कुमार मिश्र"अणु"
बुद्धि गई मारी,
तभी तो हारते रहे-
सबकुछ बारी-बारी!!
         भरी सभा में खुलेआम,
          लोग देखते रहे अन्याय।
          बने रहे मुक दर्शक सभी-
          न कर सके प्रतिकार हाय।
           भूल थी या गलती भारी!!
धूर्त शकुनि हंसता रहा,
प्रफुल्लित मन दुर्योधन।
विदुर,भीष्म और आचार्य-
स्वीकारते रहे दुर्व्यसन।
ऐसी क्या थी लाचारी!!
        हारे हुए पांच पांडव को,
        चलो मानता हुं लाचार थे।
        पर धृतराष्ट्र के सभा में तो-
        एक से एक गुणागार थे।
        न्याय का काम  विसारी!!
 युधिष्ठिर,भीम,अर्जुन निपुन-
थे न्याय,बल गुण कर्म से।
नकुल-सहदेव देखते रहे सब-
दीन बन शर झुकाए शर्म से।
हो निस्प्रभ बन भिखारी!!
       पुछती रही सबसे दरबार में,
       चिखती रही अबला नारी।
       कौरव करता रहा अन्याय-
       कर नंगा खोल दे साडी।
       तब हे नाथ पुकारी!!
हलांकि भीम तमतमाया था,
तब युधिष्ठिर ने उसे रोका।
अर्जुन तो विस्मित था देख-
ये है कौन सा झोका।
सहदेव पर दृष्टि डारी!!
           त्रिकालदर्शी था सहदेव,
           उसने भविष्य बतलाई।
           भईयों चिंतातुर मत हो-
           इसका निदान है यदुराई।
           वासुदेव कृष्ण गीरधारी!!
थक गया दुश्शासन,
न कर सका अनावरण।
सलज्ज रही  द्रुपद सुता,
दे महाभारत का आमंत्रण।
प्रतिशोध की जगा चिंगारी!!
       --:भारतका एक ब्राह्मण.