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बेटियों को ही नहीं, अब बेटों को भी संस्कारवान बनाएँ

बेटियों को ही नहीं, अब बेटों को भी संस्कारवान बनाएँ

कुमार महेंद्र

मर्यादा की लक्ष्मण-रेखा,
क्यों लिखी बेटियों के भाग।
अब समय आ गया है बदलें,
मनगढ़ंत ये रीत-रिवाज।
सुखमय हो हर घर-आँगन,
समता की अलख जगाएँ।
बेटियों को ही नहीं, अब बेटों को भी संस्कारवान बनाएँ।।


बेटियों को सदा सिखाया,
झुककर चलना, लज्जा रखना।
अब बेटों को भी सिखलाएँ,
नारी का सम्मान है करना।
अपनी बहन संग जैसा व्यवहार,
वैसा ही जग में अपनाएँ।
बेटियों को ही नहीं, अब बेटों को भी संस्कारवान बनाएँ।।


सहनशीलता, संयम, सेवा,
केवल नारी के आभूषण क्यों?
क्रोध, अहंकार, दंभ की अग्नि,
पुरुषों के हिस्से फिर क्यों?
भूल हो जाए तो उसे सुधारें,
विनम्रता का दीप जलाएँ।
बेटियों को ही नहीं, अब बेटों को भी संस्कारवान बनाएँ।।


शील-सदाचार से महकेगा,
हर बेटे का जीवन-उपवन।
सुरक्षित होगी हर एक राह,
सुखमय होगा मानव-जीवन।
तजकर संकीर्ण वासनिक सोच,
दृष्टि में आदर-भाव सजाएँ।
बेटियों को ही नहीं, अब बेटों को भी संस्कारवान बनाएँ।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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