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मेहंदी के संग, खिले प्रीत-परिणय के रंग

मेहंदी के संग, खिले प्रीत-परिणय के रंग

कुमार महेंद्र
यह एक दिवस का उत्सव नहीं,
जीवन-भर का मधुर प्रसार।
दो धड़कनों के मिलन से रचता,
स्नेह-सिक्त यह प्रेम संसार।
जब धूमिल होने लगे दांपत्य की ज्योति,
फिर जाग उठे अनुराग-उमंग।
मेहंदी के संग, खिले प्रीत-परिणय के रंग।।


जब-जब उलझे गृहस्थी के तंतु,
तब-तब धैर्य ने राह दिखाई।
सुख-दुख के हर आरोह-अवरोह में,
त्याग-तपस्या ने प्रीत निभाई।
मधुर समर्पण से खिलता दांपत्य,
ज्यों सरिता में उठती मधुर तरंग।
मेहंदी के संग, खिले प्रीत-परिणय के रंग।।


तीज-त्योहारों की मंगल बेला में,
जब मेहंदी हथेली पर सजती है।
वर्षों पुराने पावन बंधन में,
फिर नव-प्रणय-धुन आकर बजती है।
उम्र भले ही रेखाएँ लिख दे,
मन झूमे बनकर मस्त मलंग।
मेहंदी के संग, खिले प्रीत-परिणय के रंग।।


यह मर्यादा की मूक वंदना,
अर्धांगिनी का गौरव-गान।
जिसके स्नेहिल स्पर्श मात्र से,
महक उठे जीवन का उद्यान।
संबंधों में मिठास घोलकर,
मन में भर दे नेह-तरंग।
मेहंदी के संग, खिले प्रीत-परिणय के रंग।।


मेहंदी केवल रंग नहीं है,
यह प्रणय-प्रतिज्ञा का प्रमाण।
इसके हर पत्ते में लिखा हुआ,
प्रियतम का मान सम्मान।
सात जन्म की मंगल कामना,
सात वचनों का पुनीत प्रसंग।
मेहंदी के संग, खिले प्रीत-परिणय के रंग।।


जब तक साँसों का साथ रहे,
तब तक नेह निखरता जाए।
ऋतुएँ बदलें, वर्ष गुजरें,
फिर भी प्रणय-सुमन मुस्काता जाए।
हाथों की मेहंदी भले मिट जाए,
जीवन महकता रहे खुशियों के संग।
मेहंदी के संग, खिले प्रीत-परिणय के रंग।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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