कल्पना से क्रांति तक
अरुण दिव्यांशकल्पना से क्रांति तक ,
सत्यता से भ्रांति तक ,
हर पथ से सुगम होता ,
अशांति से शांति तक ।
हर पथ स्वाद चखा है ,
अनुभव पूर्ण पका है ,
खट्टा मीठा औ कटुता ,
हर स्वाद से छका है ।
मत जियो कल्पना में ,
किंतु क्रांति जरूरी है ,
किंतु अहम न करना ,
अहम ही मगरूरी है ।
जीकर देखा हर पथ मैं ,
हर पथ दिखा मोड़ था ,
था मोड़ नहीं हकीकत ,
निज मन बैठा चोर था ।
मस्तिष्क में था अशांति ,
मन में मचा ये शोर था ,
मस्तिष्क ये शांति आई ,
हो चुका तब भोर था ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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