भाग्य रेखा

भाग्य रेखा

जय प्रकाश कुवंर
मनुष्य न हांथों की लकीरें गढ़ सकता है,
न लिलार की रेखायें पढ़ सकता है।
जो बात मनुष्य के हाथों में है वह केवल,
जीवन निर्वाह के लिए कर्म कर सकता है।।
भाग्य पर नाहक पश्चाताप करने से क्या फायदा,
ईश्वर से गिला शिकायत करना हम छोड़ दें।
मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं विधाता है,
केवल अपना कर्म कर ईश्वर से नाता जोड़ लें।।
कर्म के अनुसार ही रेखायें बदलती रहती हैं,
कर्म ही मानव जीवन का एक मात्र आधार है।
भाग्य भरोसे निठल्ला हो बैठना मुनासिब नहीं,
हाथ और लिलार की रेखाओं का चिंतन बेकार है।।

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