पक्षियों का घोंसला

पक्षियों का घोंसला

अरुण दिव्यांश
पक्षियों का भी जमाना ,
पक्षियों का भी है राज ।
ताजहीन है हुआ मानव ,
पक्षियों को मिला ताज ।।
खग करते व्योम में सैर ,
पर धरा पे ठौर है होता ।
प्यारा बनाए ये खग नीड़ ,
निशा में चैन नींद सोता ।।
ईश्वर ने दिया है पर उसे ,
पर अहंकार से भरा नहीं ।
क्षुधा भर ही दाने चुगता ,
नीड़ भरना तो वरा नहीं ।।
पक्षी देता हमें है शिक्षा ,
नीड़ चाहिए करने वास ।
नभ में उड़ो जितना चाहो ,
धरा का ही करना आस ।।
सर छुपाने हेतु नीड़ हो ,
समय पकड़ने की प्यास ।
उदास कभी तू होना नहीं ,
बस समय का बनो दास ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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