प्रणय पथ पर, टूट रहीं मौन शिलाएँ
कुमार महेंद्रसदियों से जो मौन हृदय था,
आज प्रेम में गाया है।
हिम-सा जमा हुआ अंतर्मन,
स्नेह-सुधा से पिघलाया है।
अंतर में छिपकर सोई थीं,
अनगिन मधुर अभिलाषाएँ।
प्रणय पथ पर, टूट रहीं मौन शिलाएँ।।
जिस पथ पर कोई न आया,
वह पथ बड़ा वीराना था।
धड़कन में संगीत न था,
मन सूना-सा ठिकाना था।
प्रेम-पवन के स्पर्श से जागीं,
सोई हुईं संवेदनाएँ।
प्रणय पथ पर, टूट रहीं मौन शिलाएँ।।
अधरों पर जो ठहर गई थीं,
अनकही हृदय की बातें।
आज सजल नयनों में जागीं,
मधुर मिलन की सौगातें।
भावों के अंकुर फूट पड़े,
महक उठीं नव आशाएँ।
प्रणय पथ पर, टूट रहीं मौन शिलाएँ।।
संकोचों के बंधन टूटे,
बह निकली भाव-सरिता।
प्रेम-रंग में निखर उठी,
जीवन की सूनी कविता।
मुक्त हृदय से गूँज उठीं,
प्रणय-पगी मधुरिम ऋचाएँ।
प्रणय पथ पर, टूट रहीं मौन शिलाएँ।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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