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हरियाली और कच्ची सड़कें

हरियाली और कच्ची सड़कें

जय प्रकाश कुवंर
हमने तो कच्ची सड़कों पर चलकर,
अपने बचपन के दिन गुजारे हैं।
आज भले सब कुछ का,
पक्की करण हो रहा है, पर
वो पुराने दिन भी कितने न्यारे हैं।।
कच्चा धर था, कच्ची सड़कें थी,
पर शुद्ध हवा और शुद्ध खाना मिलता था।
मनुष्य का जीवन खुशहाल था,
और जीवन को सुकून मिलता था।।
कच्ची सड़कों के आस पास,
फसलों और पेड़ पौधों की,
हरियाली मन लुभाती थी।
इन सड़कों पर चलते हुए,
दिल में एक अजीब सुकून आती थी।।
गर्मी में धूल और बरसात में कीचड़,
भले ही इन सड़कों पर सजता था।
पर इन प्राकृतिक माहौल में,
इन सड़कों पर चलना,
मन को सुकून देता और ,
स्वास्थ्य के लिएअच्छा लगता था।।
आज विकास के नाम पर,
पेड़ काटकर पक्की सड़कें,
सिंगल लेन से सिक्स लेन तक या,
उससे भी ज्यादा लेन की सड़कें बन गयीं।
पर सड़कों के आसपास दूर तक,
पेड़ पौधे और हरियाली न रहने से,
विरानी सी छा गयी।।
पक्की सड़कों ने रफ्तार तो दिया,
पर स्वास्थ्य का रफ्तार कम गया।
तरह तरह की बिमारियाँ फैलने लगी,
जिनका नाम सुनकर दिल सहम गया।।
सही तो यह है कि आदमी ने,
स्वास्थ्य के साथ विकास और रफ्तार का,
सौदा किया है।
ईश्वर ने एक प्राकृतिक माहौल,
जो हम मानवों को दिया था,
इस चौतरफा पक्कीकरण और,
तथाकथित विकास के माहौल ने,
वो सब हमसे छिन लिया है।।

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