बदलते कल की नई दस्तक
अरुण दिव्यांशबदल रहा यह युग अब तो ,
बदल रहे तो अब तुम हो ।
बदलता युग यह देखकर ,
हो रहे क्यूॅं तुम ये गुम हो ।।
दिखता नहीं अपना बदलाव ,
जाने कहाॅं गुम यह मस्तक ।
सुन लो बुरी नजर वाले तुम ,
बदलते कल की नई दस्तक ।।
नई दस्तक की नई है चुनौती ,
जाने प्यार यह या अहंकार ।
बचाएगा हमको ये डूबने से ,
या डूबो देगा हमे मजधार ।।
भाग रहे हम कलियुग देख ,
हमें देख कलियुग भाग रहा ।
आ रहा अब है सत्ययुग पुन: ,
सनातन संस्कृति जाग रहा ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8



0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews