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बिहार के हालात - बचाव सभे मिलके अब ईआर

बिहार के हालात - बचाव सभे मिलके अब ईआर

डॉ. विवेकानंद मिश्र
बन गेल हंस के नेता कतनो,
उनकर मंत्री-सचिव सियार,
चोर-लफंगा करता-धरता,
देखे अप्पन बिहार।
कहां गेल ऊ गौरव हम्मर,
कहां गेल संस्कार?
आंख खोल के सोचऽ बिहारी,
कइसन हो गेल संसार।

बचाव सभे मिलके अब ईआर,
बचाव सभे मिलके अब ईआर।
जात-पात के जंजाल छोड़ऽ,
जागऽ अब बिहार!

लूटपाट आउ गुंडागर्दी के
चारों तरफ बाजार,
धन, इज्जत आउ जान सभी के
दांव पर बा परिवार।
मेहनत करे वाला डर में जीए,
ई कइसन व्यवहार?
न्याय के राह कठिन भइल बा,
कहां गइल अधिकार?

बूढ़ा बाप के आंख में चिंता,
माई के मन में भार,
बेटा-बेटी के भविष्य खातिर
हर दिन नयका विचार।
किसान खेत में पसीना बहावे,
मजदूर करे श्रम अपार,
फिर भी काहे सपना टूटे,
काहे सूना घर-द्वार?

बचाव सभे मिलके अब ईआर,
बचाव सभे मिलके अब ईआर।
मेहनत, शिक्षा, सत्य, सदाचार—
बनावे फिर से बिहार।

चरस, हेरोइन, गुटका, दारू,
घर-घर पहुंचल उधार,
नशा के आग में झुलस रहल बा
कितने घर-परिवार।
दूध-दही आउ खीर-पकौड़ी,
हमर संस्कृति के आधार,
नशे के धंधा बीच में आके
कर देहल सब बेकार।

माई के आंख में सपना रहल-
बेटा बने होनहार,
बाबूजी चाहें बेटी पढ़ के
करसु कुल के उद्धार।
लेकिन नशा अगर घर में घुसल,
टूटे सुख के द्वार,
एक नशेड़ी के साथ उजड़ेला
कितना-कितना संसार।

बचाव सभे मिलके अब ईआर,
बचाव सभे मिलके अब ईआर।
नशा छोड़ऽ, शिक्षा जोड़ऽ,
फेर हंसे बिहार।

कामचोर आउ हरामखोर के
बढ़ल कहे संसार,
पर मेहनतकश के हाथ में आजो
भारत के आधार।
जात-पात आउ ऊंच-नीच के
झंझट हजार,
इंसानियत के ऊपर आखिर
काहे जाति के भार?

काहे कोई छोट-बड़ होई,
काहे कोई लाचार?
एके माटी, एके गंगा,
एके धरती के प्यार।
मगध, मिथिला, भोजपुर, अंग-
सबके अलग बहार,
भाषा-बोली अलग सही लेकिन
एके बा परिवार।

बचाव सभे मिलके अब ईआर,
बचाव सभे मिलके अब ईआर।
भेदभाव के दीवार गिरावऽ,
जोड़ऽ पूरा बिहार।

धरम-करम आउ नैतिकता के
देखऽ हालत आज,
दया, धर्म आउ आदर्शन के
कहां रहल आवाज?
बुजुर्गन के सम्मान घटल बा,
टूटत पारिवारिक राज,
सच बोले वाला अकेला पड़ेला,
झूठ करे उत्सव आज।

धर्म अगर मन में दया न जगावे,
तब धर्म के का सार?
पूजा, पाठ, नमाज, अरदास से
पहिले मानवता प्यार।
मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा-चर्च
सबके पावन द्वार,
मन में नफरत राख के आखिर
कइसन होई उद्धार?

बचाव सभे मिलके अब ईआर,
बचाव सभे मिलके अब ईआर।
दया, धर्म आउ सत्य के जोती
करऽ उजियार बिहार।

बात-बात पर गोली-बम के
भाषा काहे प्यार?
बारूद से कब फूल खिलल बा,
कब बसल परिवार?
बुद्ध के धरती, महावीर के धरती,
ज्ञान के महान भंडार,
नालंदा के दीप बुझल रहे,
फेर जलावऽ संसार।

जहां से ज्ञान के सूरज उगलल,
जहां गूंजल विचार,
उहे धरती आज हिंसा देखे-
ई कइसन लाचार?
बुद्ध-विवेक के दीप जला के
करऽ अंधेरा पार,
प्रेम, अहिंसा, सत्य के राहे
बन सके नया बिहार।

बचाव सभे मिलके अब ईआर,
बचाव सभे मिलके अब ईआर।
बुद्ध-विवेक के दीप जलावऽ,
फेर चमके बिहार।

हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई-
सबके ह घर-दुआर,
सबके माथे एके अंबर,
सबके धरती एके सार।
किसी के पूजा, किसी के प्रार्थना,
किसी के अलग विचार,
लेकिन दुख में साथ खड़ा होई
ई सबसे बड़ संस्कार।

ईद के सेवइयां, होली के रंग,
दीपावली के बहार,
गुरुपर्व के लंगर में मिलके
बैठे सब परिवार।
छठ के घाट पर हाथ जुड़ेला
पूरा समाज अपार,
यही त बिहार के पहचान हऽ,
यही त असली श्रृंगार।

कहां बिहार हल, कहां चल गेल,
सोचऽ बारंबार,
गलती अगर भइल बा हमसे,
अब करऽ सुधार।
दोष अकेले दूसर पर धर के
कब बदली हालात?
अपने घर से शुरुआत करीं त
बदली दिन-रात।

बेटा-बेटी पढ़ल-लिखल होसु,
ई हो पहिला विचार,
नशा-मुक्त हो गांव-गली सब,
स्वच्छ रहे बाजार।
रोजगार मिले नौजवानन के,
किसान के मिले सम्मान,
महिला के सम्मान मिले अउ
बढ़े बिहार के मान।

नैतिक शिक्षा घर में आवे,
विद्यालय में संस्कार,
बुजुर्गन के आशीष मिले अउ
बच्चन में व्यवहार।
सड़क, अस्पताल, स्कूल सुधरे,
बढ़े ज्ञान-व्यापार,
ईमानदारी के मेहनत से
बन सके नया बिहार।

समय बहुत बा, लेकिन सुनऽ अब
समय न करऽ बेकार,
बदलाव कोई दूर के सपना
नहीं, खड़ा बा द्वार।
एक कदम तू, एक कदम हम,
मिल जाए हजार,
छोट-छोट कोशिश मिलके
बनावे नया बिहार।

ना गोली से, ना गाली से,
ना नफरत के वार,
प्रेम, विवेक, शिक्षा, श्रम से
होई जीवन साकार।
सत्य के राह कठिन सही, पर
अंततः उहे आधार,
मिलजुल के जब हाथ बढ़इबऽ,
फेर चमकी बिहार।

बचपन हंसे, जवान बढ़े,
बूढ़न के मिले दुलार,
बहिन-बेटी निर्भय घूमे,
हर घर में हो प्यार।
किसान के खेत लहलहाए,
मजदूर के मिले अधिकार,
व्यापारी, शिक्षक, सैनिक, श्रमिक-
सबके हो सम्मान अपार।

गंगा बोले, सोन पुकारे,
कोसी करे पुकार,
गंडक, फल्गु, पुनपुन कहे-
जागऽ हे बिहार!
चंपारण के सत्याग्रह से
सीखऽ नया विचार,
जेपी के संपूर्ण क्रांति के
याद करऽ आधार।

राजा बदलल, राज बदलल,
बदलल कई सरकार,
लेकिन जनता के जीवन खातिर
जरूरी बा व्यवहार।
कागज पर विकास लिखल से
नहीं बदले संसार,
जब तक अंतिम आदमी के
न पहुंचे अधिकार।

इसलिए मिलके सोचऽ अब तू,
का चाहऽ परिवार?
शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार कि
नफरत के व्यापार?
अपना मन से प्रश्न पूछऽ,
दे खुद के जवाब,
काहे टूटे समाज हमारा,
काहे बढ़े तनाव?

बिहार हमारा, हम बिहार के,
ई रिश्ता बा मजबूत,
माटी के ई कर्ज चुकावे
रहऽ सदा सजग-सचेत।
अपना कर्म से नाम कमावऽ,
अपना श्रम से मान,
दूसर के हक मत छीनऽ,
यही मनुष्य के शान।

आओ मिलके शपथ उठाईं-
नशा से रखबऽ दूरी,
हिंसा से रखबऽ दूरी,
झूठ-फरेब से दूरी।
जात-पात के भेद मिटाईं,
बढ़ाईं भाईचारा,
सत्य-अहिंसा-प्रेम के दीपक
करऽ घर-घर उजियारा।

बुद्ध के ज्ञान, महावीर के तप,
विद्यापति के प्यार,
आर्यभट्ट के गणित, चाणक्य के
नीति के संस्कार,
गुरु गोविंद सिंह के साहस,
कबीर के विचार,
सबके लेकर आगे बढ़ऽ तू-
यही हो नया बिहार।

अब ना पूछऽ कौन दोषी बा,
पहिले पूछऽ हमार-
अपने भीतर कितना बदला,
अपने घर के व्यवहार?
समाज बदलने निकले से पहिले
बदलऽ अपना विचार,
एक-एक दीप जले अगर त
दूर होई अंधियार।

बचाव सभे मिलके अब ईआर,
बचाव सभे मिलके अब ईआर।
सत्य, सदाचार, प्रेम, विवेक से
बचाव अपना बिहार।
मिलजुल के हम राह बनाईं,
मिलके करें विचार।
फेर गूंजे दुनिया भर में-
जय-जय अपना बिहार!

बचाव सभे मिलके अब ईआर,
बचाव सभे मिलके अब ईआर।
बुद्ध-विवेक के दीप जलावऽ,
फेर चमके अपना बिहार।।

- डॉ. विवेकानंद मिश्र
डॉक्टर विवेकानंद पथ, गोल बागीचा, गया, बिहार

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