कुञ्जिका -स्तोत्र

कुञ्जिका -स्तोत्र


डॉ. मेधाव्रत शर्मा, डी•लिट•
(पूर्व यू.प्रोफेसर)
इस विषय में कुछ बन्धुओं की जिज्ञासा को लक्ष्य कर मैं यथातुच्छमति इस विषय पर किंचित् प्रकाश-क्षेपार्थ प्रवृत्त हूँ ।विज्ञता का मेरा कोई दावा नहीं।
द्वारोद्घाटन के निमित्त उपादेय है कुञ्जिका अर्थात् चाबी (kea)। यथा कहा है,कुण्डलिनी-योग की साधना-रूपी कुञ्चिका से योगिजन मोक्षद्वार-उद्घाटन में
समर्थ होते हैं---
"उद्घाटयेत् कपाटं तु यथा कुञ्चिकया हठात्।
कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं विभेदयेत्।।"
(हठयोगप्रदीपिका-3/105)
तद्वत् श्रीदुर्गासप्तशती के प्रसंग में उक्त स्तोत्र दुर्गा-तत्त्व को सम्यक् हृदयंगम कर नवार्णमन्त्र रूपी कुञ्जिका से मोक्ष-द्वार के उद्भेदन का उपक्रम है।
कुञ्चिका-स्तोत्र नवार्णमन्त्र का मर्मोद्घाटक है। नौ अक्षरों (syllables)से घटित नवार्णमन्त्र है--
"ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे l"
इसके आदि में 'ॐ' लगाना अनर्गल स्वेच्छाचारिता है ।किसी भी शास्त्र -सिद्ध मन्त्र के स्वरूप में स्वैर हस्तक्षेप (arbitrary meddling)कदापि उचितनहीं ।
इस मन्त्र की स्थापित नवार्णता अत्यन्त अभिप्रायपूर्ण है। इस विषय में किंचित् प्रकाश मैं 'दुर्गा -तत्त्व 'शीर्षक आलेख में डाल चुका हूँ।
ध्यातव्य है कि "ऐं ह्रीं क्लीं "--ये तीनों बीज 'ॐ' के ही तान्त्रिक प्रतिरूप हैं,अतएव आदि में ॐका संयोजन अनर्गल है,इसलिए भी कि ऐसा करने से मन्त्र की स्वरूपभूत नवार्णता खण्डित होती है,फलतः अपराध है।
उदाहरणस्वरूप 'ह्रीं 'बीज को लें--
"हकारस्य पुंरूपत्वादर्कत्वम् ईकारस्य शक्तिरूपत्वात् सोमत्वम् रेफस्य अग्निरूपत्वात् अग्निरूपत्वम् =ह्रीं (शारदातिलक-2/8 पर राघवभट्ट का पदार्थादर्श)।स्पष्टतः सूर्य (अर्क)सोमाग्निरूपत्व से ह्रीं का
ओंकारत्व सुसिद्ध है ।
उसी प्रकार प्रकार 'क्लीं 'का भी ओंकारत्व समाम्नात है-"क्लीमोंकारस्य चैकत्वं पठ्यते ब्रह्मवादिभिः (गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद्-17)।"वस्तुतः सभी तान्त्रिक बीजमन्त्रों का ओंकारत्व प्रथित है।
' चामुण्डा '-काली का यह 'अभिधान-विशेष भी अपने वैलक्षण्य में ध्यातव्य है। लीलावाद के परिप्रेक्ष्य में एक ही महाशक्ति के तदनुरूप नाम-रूप परिकल्पित हैं ।
काली द्वारा चण्ड-मुण्ड नामक महा असुरों का वध कर उनके मस्तकों को लेकर वह चण्डिका के निकट पहुँचती है,तो वह काली को 'चामुण्डा 'नाम से अभिहित करते हुए बोल उठती है--
"यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता।
चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यति ।।"
(सप्तशती-7/27)
वैयाकरणिक आधार पर एतद्विध प्रयोग विचारणीय नहीं। अलबत्ता निरुक्ति-न्याय से ग्राह्य है।
'ललितासहस्रनामस्तोत्रम् 'में भी महादेवी राजराजेश्वरी ललिता का एक नाम "चण्डमुण्डासुरनिषूदनी "(750) परिगणित है। श्रीविद्या के परम सिद्ध महापुरुष श्रीमद्भास्करराय (तान्त्रिक नाम श्री भासुरानन्द नाथ)ने इस पर अपने भाष्य 'सौभाग्य भास्कर'में विशद प्रकाश डाला है।
तदनुसार "चामुण्डा "नाम के अनेक आयाम उद्घाटित हुए हैं।

वराहपुराण में देवी रुरु नामक दैत्य का त्रिशूल से वध कर उसके पृथग्भूत चर्म-मुण्ड को अपहृत कर देवी विचरण करती है,इसलिए उसका नाम "चामुण्डा "ख्यात हुआ ।इस कथात्मक विवरण के आलोक में देवी का 'चर्ममुण्डा 'नाम भी संकेतित है ।अमरकोष में "चर्चा तु चार्चिक्यं स्थासकः " चन्दनादि से देहविलेपन "के पर्याय पठित हैं। प्रसिद्ध टीका 'अमरव्याख्यासुधा 'में 'चर्चा 'और 'चार्चिक्य' 'चर्ममुण्डा 'के अर्थ में भी उक्त है ।स्त्रीलिंग में "चार्चिक्या ' होगा ।तद्वत् चर्ममुण्डा और चार्चिक्या भी देवी (काली)के अन्य नाम आलोकित होते हैं। चामुण्डा किंवा चर्ममुण्डा लालाटिक अलंकरण-विशेष भी है ।इसके धारण से भी "चामुण्डा "नाम की अन्वर्थता संभाव्य है।चण्ड,प्रचण्ड अत्यन्त कोपनचिह्नभूत-नेत्रशोणितादियुक्त असुरों के मुण्डों का निषूदन करने से भी 'चामुण्डा' नाम की अन्वर्थता ध्वनित होती है। किंबहुना,तादृश हन्यमान असुरों के मुण्डों की माला के धारण के स्वारस्य से मुण्डमालिनी काली का अभिप्राय भी 'चामुण्डा 'नाम से ध्वनित होता है।
इस संदर्भ की सम्यक् अवधारणा के लिए सौभाग्यभास्कर (नवमी विश्वा कला 196) द्रष्टव्य है।


तथोक्त "कुञ्चिका-स्तोत्र "में 'चामुण्डायै ' चामुण्डा से चतुर्थविभक्त्यात्मक 'यै 'को पृथक् कर अर्थ-निष्पत्ति की गई है,जो निरुक्त्यात्मक भले हो,व्युत्पत्त्यात्मक कदापि नहीं और 'यैकारी 'का अर्थ किया है 'वरदायिनी '--यह भी स्पष्टतः एक वैलक्षण्य ही है। अलबत्ता यह जरूर है कि चतुर्थी विभक्ति 'संप्रदान 'के अर्थ में होने के कारण उक्त तात्पर्य की गुंजाइश किंचित् बन जाती है।
कुञ्चिका-स्तोत्र के शेष अंश में षड् अभिचारों (शारदातिलक के शब्दों में 'षट्कर्म') से संबंधित मन्त्र संग्रथित हैं। आभिचारिक मन्त्रों का सकारात्मक भावों में प्रयोग अभिप्रेत हैं। यथा,'मारण 'से कामक्रोधादि का मारण अभिप्रेत है। षट्कर्म (षड् अभिचार)हैं--
"शान्तिवश्यस्तम्भनानि मोहनोच्चाटनादिकम्।
मारणान्तानि शंसन्ति षट्कर्माणि मनीषिणः।।"
अर्थात् शान्ति,वश्य (वशीकरण),मोहन,स्तम्भन,उच्चाटन और मारण षट्कर्म (अभिचार)हैं ।
'विच्चे ' की व्युत्पत्ति को लेकर माथापच्ची बेमतलब की है ।बीजमन्त्र का महत्त्व नादात्मक होता है। विधिवत् उच्चारण से जो नाद की लहर वायुमंडल में व्याप्त होती है,उसकी आध्यात्मिक प्रभावशालिता अनिर्वचनीय होती है,जो सच्चे साधक को ही यथार्थतः अनुभूत होती है ।
मेरे विनम्र मत में कुञ्चिका-स्तोत्र के मर्म को हृदयंगम करने के लिए इतना विवेचन यथेष्ट है।अनर्गल जगड्वाल अनपेक्षित है। हाँ,इतना निवेदन अनावश्यक न होगा कि यह आलेख तन्त्र-विद्या की थोड़ी-बहुत समझ रखनेवालों के लिए ही उपादेय है,जनसाधारण के लिए नहीं।
"जय माँ!"
------------------
"ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे " -----------
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ