क्या करूँ?


क्या करूँ? 

डॉ. मेधाव्रत शर्मा, डी•लिट•
(पूर्व यू.प्रोफेसर)
इस रूमाल को क्या करूँ?
तुम्हारे खयालों में
औचक डूब गया
इस कदर कि रोकने पर भी
रुक नहीं पाए
आँसू बेकाबू
आँसुओं से तर-बतर
इस रूमाल को क्या करूँ?
रख दिया है यूँ ही सिरहाने
अब यह रूमाल रूमाल न रहा
तुम्हारी स्मृति के पुरदर्द
परिपूर्ण क्षण-विशेष का
तबर्रूक (relic)हो गया
इस्तेमाल नहीं नहीं कर सकता अब
इसे धो-पोंछ कर
रूमाल की नाईं पहले की तरह
इसे उठाने को बढ़ता हाथ
रुक जाता है
काँप कर बेतरह
प्राण!बोलो
इस रूमाल को क्या करूँ?
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