जिनको अपना समझ रहे,

जिनको अपना समझ रहे,

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
जिनको अपना समझ रहे, आस्तीन के साँप थे,
घर के भीतर पलने वाले, कुछ से रिश्ते ख़ास थे।
माली को दोष दें कैसा, उस पर भी तो बंदिश थी,
घर वाले ही उनके रक्षक, जो ज़हरीले नाग थे।

घर के राज बाहर बताये, कोई अपने खास थे,
जिनसे कुछ भी छिपा नही, वह अपने खास थे।
खाने लगे मेंढ खेत को, किस पर विश्वास करें,
मुल्क को धोखा देने वाले, वह अपने खास थे।

हारे नहीं कभी दुश्मन से, लगा रहे जो घात थे,
किया भरोसा अपनों पर, तत्पर जो प्रतिघात थे।
समझ सके ना चौकीदार ही, चोरों का सरदार है,
हमदर्दी दिखलाकर हमसे, करते विश्वासघात थे।।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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