मार मार मैं तो मरा

मार मार मैं तो मरा

मार मार मैं तो मरा ,
मैं तुझसे ही बना हूॅं ।
राम रमा मेरे जज्बे में ,
रावण बन ही तना हूॅं ।।
राम रमा से रावण है ,
जिसके हेतु आया है ।
धन्य सौभाग्य है मेरा ,
रोम रोम में बसाया है ।।
मैं तो मरा हूॅं एक बार ,
बार बार मुझे मारते हो ।
राम है जीता एक बार ,
तू बार बार ही हारते हो ।।
मार कहाॅं पाते मुझको ,
तेरे रोम रोम में रमा हूॅं ।
जितने राम न समाहित ,
उससे अधिक समा हूॅं ।।
राम द्वारा तो कभी मरा ,
राम मरा दोनों ही एक है ।
मार मार तो रमा रमा है ,
कहाॅं तेरा यह विवेक है ।।
जितना मुझे जलाओगे ,
उतना अधिक ही जलोगे ।
मैं खड़ा रहूॅंगा संग तेरे ही ,
संग मेरे कहाॅं तक चलोगे ।।
हार जाओगे हराते हराते ,
मैं न तुझसे कभी हारूॅंगा ।
तू जलाए पुतला बनाकर ,
तुझे अंदर अंदर मारूॅंगा ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ