तुम्हारी प्रणय-सुरभि से, तन-मन हो रहा निहाल

तुम्हारी प्रणय-सुरभि से, तन-मन हो रहा निहाल

कुमार महेंद्र
मलय-पवन-सी छू गई,
तेरी मुस्कान की छाँव।
सूनी-सूनी मरुधरा पर,
खिल उठा वसंत का गाँव।
नयनों ने नयनों से रचा,
सपनों का सुनहरा जाल।
तुम्हारी प्रणय-सुरभि से, तन-मन हो रहा निहाल।।


तुम रश्मि बनकर आ गईं,
जीवन के आकाश।
तिमिर तिरोहित हो गया,
मन में जगा प्रकाश।
चंदन-सी महकने लगी,
जीवन वृक्ष की हर डाल।
तुम्हारी प्रणय-सुरभि से, तन-मन हो रहा निहाल।।


लाज से झुकी पलकें तेरी,
अधरों पर मधुरिम मौन।
तेरे प्रेम-सुधा के आगे,
आकर्षक जग में कौन?
तेरे अनुराग ने रँग दिया,
जीवन का चित्र विशाल।
तुम्हारी प्रणय-सुरभि से, तन-मन हो रहा निहाल।।


तेरे हाथों में हाथ रहे,
युग-युग तक रहें संग।
प्रेम-सुधा बरसती रहे,
मन में अनुराग-तरंग।
तू आदि, तू ही अंत प्रिय,
तेरी प्रीति बेमिसाल।
तुम्हारी प्रणय-सुरभि से, तन-मन हो रहा निहाल।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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