"पुरुषार्थ से भाग्य-निर्माण"

"पुरुषार्थ से भाग्य-निर्माण"

 पंकज शर्मा 
परिस्थितियाँ मनुष्य के पुरुषार्थ की सीमा तय नहीं करतीं, बल्कि उसकी चेतना एवं संकल्प शक्ति का परीक्षण करती हैं। जो व्यक्ति परिस्थितियों के सम्मुख नतमस्तक होने के बजाय उन्हें अपनी इच्छाशक्ति से आकार देते हैं, वे ही इतिहास के पृष्ठों पर अपना अमर पदचिह्न छोड़ते हैं। कायरता नियति की आड़ में स्वयं को छलती है, जबकि जीवंतता बाधाओं को ही सफलता के सोपानों में रूपांतरित कर देती है।

वास्तविक भाग्य किसी पूर्व-लिखित विधान की देन नहीं, अपितु निरंतर कर्म-साधना से निर्मित होने वाला प्रतिफल है। जब मनुष्य अपनी आंतरिक सामर्थ्य को पहचानकर संकीर्ण सीमाओं का अतिक्रमण करता है, तब प्रतिकूलताएँ भी उसका मार्ग प्रशस्त करने लगती हैं। संकल्पबद्ध कर्म ही वह दिव्य शिल्प है, जिससे मनुष्य स्वयं अपने उज्ज्वल भविष्य की संरचना करता है।

. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा एवं संस्कार) 
 पंकज शर्मा "कमल सनातनी"
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