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नहीं किया जिसने लाल ऑंखें

नहीं किया जिसने लाल ऑंखें

अरुण दिव्यांश
नहीं किया जिसने लाल ऑंखें ,
भारत का ही था जो सच्चा लाल ।
था दिखाता जो ऑंख भारत को ,
उसका साक्षात होते थे वे काल ।।
भारत के थे पक्के वीर बहादुर ,
पक्के भारतीय राष्ट्रीय थे भक्त ।
आडंबर के थे वे कट्टर विरोधी ,
निज उसूलों में थे स्वयं आसक्त ।।
शस्त्र कभी नहीं उठाया जिसने ,
हस्त शोभायमान जिनके शास्त्र ।
वाणी में जिनके घुला शहद था ,
वाणी में जिनके भरा आग्नेयास्त्र ।।
भारत के थे वे तो सच्चे सेवक ,
किसानों का बहुत बड़ा सहारा था ।
जवानों के भी थे सच्चे मनोबल ,
जय जवान जय किसान नारा था ।।
भारत के थे वे तो बहुत ही प्यारे ,
भारत भी उन्हें उतना ही प्यारा था ।
गरीबी झेला था बचपन में जिसने ,
किंतु हिम्मत जिसने नहीं हारा था ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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