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धार्मिक न्यास बोर्ड हो या केंद्र सरकार, धर्म और धार्मिक परंपराओं के प्रति जवाबदेही कहां?

धार्मिक न्यास बोर्ड हो या केंद्र सरकार, धर्म और धार्मिक परंपराओं के प्रति जवाबदेही कहां?

  • रमेश कुमार और प्रेम सागर पाण्डेय के साथ विशेष बातचीत में धर्म, आस्था, मंदिरों के प्रबंधन और सरकारों की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
दिव्य रश्मि विशेष संवाद

भारत की पहचान केवल एक भौगोलिक सीमा, राजनीतिक व्यवस्था अथवा प्रशासनिक ढांचे से नहीं है, बल्कि इसकी आत्मा यहां की सनातन संस्कृति, धार्मिक परंपराओं, आध्यात्मिक चेतना और लोकमंगल की भावना में बसती है। हजारों वर्षों से इस देश की सामाजिक संरचना में मंदिरों, मठों, तीर्थस्थलों, धार्मिक संस्थाओं और आध्यात्मिक परंपराओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन संस्थाओं ने केवल पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों को ही जीवित नहीं रखा, बल्कि शिक्षा, सेवा, संस्कार, दान, परोपकार और सामाजिक समरसता की परंपरा को भी आगे बढ़ाया है। ऐसे में जब धार्मिक संस्थाओं के संचालन, मंदिरों के प्रबंधन, धार्मिक न्यास बोर्ड की जिम्मेदारियों और केंद्र सरकार की भूमिका पर प्रश्न उठते हैं, तब यह विमर्श केवल किसी एक संस्था अथवा सरकार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धर्म, समाज और शासन के पारस्परिक संबंधों से जुड़ा एक व्यापक विषय बन जाता है।

इन्हीं गंभीर प्रश्नों को केंद्र में रखकर रमेश कुमार और प्रेम सागर पाण्डेय के साथ विशेष बातचीत का विषय है—“धार्मिक न्यास बोर्ड हो या केंद्र सरकार, किसी को धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।” यह कथन धार्मिक व्यवस्थाओं के प्रति असंतोष और जवाबदेही की मांग को सामने लाता है। हालांकि, इस निष्कर्ष को सभी संस्थाओं और सरकारों पर समान रूप से लागू करने के बजाय यह समझना आवश्यक है कि धार्मिक आस्था, धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन, श्रद्धालुओं के अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही के बीच वास्तविक संबंध क्या है।

भारत में करोड़ों लोग मंदिरों और धार्मिक स्थलों को अपनी आस्था का केंद्र मानते हैं। उनके लिए मंदिर केवल पत्थर, ईंट और स्थापत्य से निर्मित भवन नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास, परंपरा और आध्यात्मिक अनुभूति के प्रतीक हैं। किसी मंदिर में प्रतिदिन होने वाली पूजा, आरती, भोग, उत्सव और धार्मिक अनुष्ठान उस परंपरा की निरंतरता को बनाए रखते हैं, जिसे अनेक पीढ़ियों ने अपने जीवन और आचरण से संरक्षित किया है। मंदिरों से जुड़े पुजारी, आचार्य, सेवक, श्रद्धालु और स्थानीय समुदाय इस व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं। इसलिए मंदिरों के संचालन से संबंधित किसी भी निर्णय का प्रभाव केवल संपत्ति अथवा प्रशासन तक सीमित नहीं होता, बल्कि धार्मिक जीवन और सांस्कृतिक निरंतरता पर भी पड़ सकता है।

यहीं से धार्मिक न्यास बोर्डों और सरकारी संस्थाओं की जिम्मेदारियों का प्रश्न उठता है। यदि किसी धार्मिक न्यास अथवा मंदिर प्रबंधन समिति को किसी धार्मिक संस्था की संपत्ति, आय, व्यवस्था और प्रशासन की जिम्मेदारी दी गई है, तो उसके प्रत्येक निर्णय में पारदर्शिता, निष्पक्षता और उत्तरदायित्व होना चाहिए। धार्मिक संस्थाओं के नाम पर प्राप्त दान और चढ़ावे का उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है, मंदिरों की आय का लेखा-जोखा कितना स्पष्ट है, धार्मिक परंपराओं के निर्वहन की व्यवस्था कैसी है और श्रद्धालुओं की शिकायतों का समाधान किस प्रकार किया जाता है—ये सभी प्रश्न स्वाभाविक भी हैं और आवश्यक भी।

धर्म के नाम पर संचालित किसी संस्था से जवाबदेही की अपेक्षा करना धर्म का विरोध नहीं है। इसके विपरीत, यह धार्मिक व्यवस्था की पवित्रता और विश्वसनीयता को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। जिस संस्था के साथ करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी हो, उसके संचालन में अनियमितता, पक्षपात, अपारदर्शिता अथवा अनावश्यक हस्तक्षेप की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। साथ ही, किसी भी आरोप को प्रमाण, दस्तावेज और निष्पक्ष जांच के आधार पर परखा जाना चाहिए, ताकि सुधार की मांग और निराधार आरोपों के बीच स्पष्ट अंतर बना रहे।

भारत के संवैधानिक ढांचे में धर्म और शासन के संबंधों को समझना भी आवश्यक है। भारतीय संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने के अधिकार से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को कुछ शर्तों के अधीन अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने तथा धार्मिक और धर्मार्थ संस्थाओं के संचालन से जुड़े अधिकार प्रदान करता है। ये अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान में निर्धारित अन्य प्रावधानों के अधीन हैं। इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक जवाबदेही को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय संवैधानिक संतुलन के रूप में देखना चाहिए।

केंद्र सरकार की भूमिका को लेकर भी कई प्रकार के प्रश्न उठते हैं। क्या धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए पर्याप्त प्रयास किए जा रहे हैं? क्या प्राचीन मंदिरों, मठों और तीर्थस्थलों के संरक्षण तथा विकास में स्थानीय धार्मिक समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित है? क्या धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों का समाधान समयबद्ध और निष्पक्ष तरीके से होता है? क्या धार्मिक संस्थाओं की समस्याओं को नीति निर्माण के स्तर पर पर्याप्त महत्व मिलता है? ऐसे प्रश्नों का उत्तर राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि नीतियों, कानूनों, प्रशासनिक निर्णयों और उनके वास्तविक परिणामों के मूल्यांकन से मिलना चाहिए।

यह भी समझना होगा कि भारत में सभी मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन की व्यवस्था एक जैसी नहीं है। कुछ संस्थाएं निजी या पारंपरिक न्यासों के माध्यम से संचालित होती हैं, कुछ धार्मिक संप्रदायों की व्यवस्थाओं के अधीन हैं, जबकि कुछ प्रमुख मंदिरों का प्रशासन संबंधित राज्य के कानूनों के अंतर्गत गठित बोर्डों या समितियों के माध्यम से किया जाता है। धार्मिक संपत्तियों और न्यासों से संबंधित अधिकार क्षेत्र भी संस्था तथा लागू कानून के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए किसी एक संस्था के अनुभव के आधार पर समूची व्यवस्था के बारे में निष्कर्ष निकालने से पहले तथ्यों और कानूनी स्थिति को समझना जरूरी है।

फिर भी, एक बुनियादी सवाल अपनी जगह कायम है—धार्मिक संस्थाओं के संचालन में श्रद्धालुओं और संबंधित धार्मिक समुदायों की आवाज कितनी प्रभावी है? यदि किसी मंदिर की परंपराओं को समझने वाले आचार्यों, पुजारियों, सेवकों और स्थानीय श्रद्धालुओं को निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा जाता है, तो असंतोष उत्पन्न होना स्वाभाविक है। धार्मिक परंपराएं केवल प्रशासनिक आदेशों से नहीं चलतीं। उनके पीछे शास्त्रीय मान्यताएं, पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं, स्थानीय आस्थाएं और समुदाय की सहभागिता होती है। किसी भी सुधार अथवा प्रशासनिक परिवर्तन में इन सभी पक्षों के प्रति संवेदनशीलता आवश्यक है।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि धार्मिक संस्थाओं को पारदर्शिता और कानून के दायरे से बाहर रखा जाए। धार्मिक संपत्ति किसी व्यक्ति या पदाधिकारी की निजी संपत्ति नहीं बननी चाहिए। यदि श्रद्धालु अपनी श्रद्धा से दान देते हैं, तो उस धन का उपयोग घोषित धार्मिक, सांस्कृतिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के अनुरूप होना चाहिए। यदि किसी संस्था की आय से शिक्षा, स्वास्थ्य, गौसेवा, अन्नदान, संस्कृत अध्ययन, वेद विद्यालय, निर्धन सहायता अथवा अन्य लोककल्याणकारी कार्य किए जाते हैं, तो उनकी जानकारी सार्वजनिक होना विश्वास को मजबूत कर सकती है। इसी प्रकार, जहां अनियमितता की शिकायत हो, वहां स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की व्यवस्था होनी चाहिए।

धर्म का वास्तविक स्वरूप लोकमंगल से जुड़ा हुआ है। भारतीय परंपरा में धर्म को केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं माना गया, बल्कि सत्य, न्याय, करुणा, संयम, कर्तव्य और परोपकार से भी जोड़ा गया है। मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे समाज के कमजोर वर्गों की सहायता करें, बच्चों की शिक्षा को प्रोत्साहित करें, जरूरतमंदों को भोजन उपलब्ध कराएं, प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करें तथा सामाजिक सद्भाव को मजबूत बनाएं। यदि धार्मिक संस्थाओं के पास पर्याप्त संसाधन हैं, तो उनके उपयोग से समाज को मिलने वाला लाभ भी स्पष्ट दिखाई देना चाहिए।

इसी संदर्भ में यह विचारणीय है कि धार्मिक न्यास बोर्डों की संरचना कैसी होनी चाहिए। क्या उनमें धार्मिक परंपराओं के जानकारों को पर्याप्त स्थान मिलता है? क्या वित्तीय प्रबंधन में विशेषज्ञता रखने वाले लोगों की भूमिका निर्धारित है? क्या श्रद्धालुओं के प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है? क्या निर्णय प्रक्रिया सार्वजनिक और उत्तरदायी है? क्या शिकायतों के निवारण के लिए प्रभावी व्यवस्था है? इन प्रश्नों पर गंभीर विमर्श धार्मिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने की दिशा में सहायक हो सकता है।

धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में संतुलन का सिद्धांत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। एक ओर पूजा-पद्धति, धार्मिक परंपरा और संप्रदाय की मान्यताओं का सम्मान होना चाहिए, तो दूसरी ओर वित्तीय अनुशासन, संपत्ति की सुरक्षा और कानून का पालन भी सुनिश्चित होना चाहिए। प्रशासनिक व्यवस्था का उद्देश्य धार्मिक आस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि संस्थाओं को सुव्यवस्थित बनाना होना चाहिए। जहां सुधार की आवश्यकता हो, वहां सुधार किया जाए; जहां परंपरा का संरक्षण जरूरी हो, वहां उसके संरक्षण के लिए उचित व्यवस्था बने; और जहां अनियमितता सामने आए, वहां जवाबदेही तय हो।

रमेश कुमार और प्रेम सागर पाण्डेय के साथ इस विशेष बातचीत का केंद्रीय प्रश्न इसी व्यापक बहस को सामने लाता है कि धर्म के नाम पर संचालित संस्थाओं और शासन व्यवस्था के बीच जिम्मेदारी का वास्तविक स्वरूप क्या होना चाहिए। क्या धार्मिक मामलों में निर्णय लेने वाले लोग धर्म की मूल भावना, परंपराओं और श्रद्धालुओं की अपेक्षाओं को पर्याप्त महत्व देते हैं? क्या धार्मिक संस्थाओं के संचालन में समाज की सहभागिता बढ़ाई जा सकती है? क्या केंद्र और राज्य सरकारें धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए अधिक स्पष्ट, पारदर्शी और प्रभावी नीतियां विकसित कर सकती हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या धार्मिक संस्थाओं के प्रति लोगों के विश्वास को मजबूत करने के लिए जवाबदेही की एक समान रूप से विश्वसनीय व्यवस्था बनाई जा सकती है?

इन प्रश्नों का उत्तर किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने से नहीं मिलेगा। धार्मिक संस्थाओं की अपनी जिम्मेदारियां हैं, सरकारों की अपनी संवैधानिक और कानूनी सीमाएं हैं तथा समाज की भी यह जिम्मेदारी है कि वह धार्मिक विरासत के संरक्षण में जागरूक और सहभागी बने। सरकार को जहां धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए, वहीं सार्वजनिक हित और कानून के अनुरूप प्रशासनिक व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी चाहिए। धार्मिक न्यासों को जहां अपनी परंपराओं का संरक्षण करना चाहिए, वहीं उन्हें अपने संसाधनों के उपयोग और प्रशासनिक निर्णयों के प्रति उत्तरदायी भी रहना चाहिए। श्रद्धालुओं को भी अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहकर संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर रचनात्मक निगरानी रखनी चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि धर्म से जुड़े प्रश्नों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के सीमित दायरे से बाहर निकालकर राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत जवाबदेही के व्यापक संदर्भ में देखा जाए। मंदिरों और धार्मिक स्थलों का संरक्षण केवल भवनों के जीर्णोद्धार तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके साथ जुड़ी परंपराओं, प्राचीन ज्ञान, शास्त्रीय अध्ययन, धार्मिक अनुष्ठानों और सेवा की भावना को भी संरक्षित करना आवश्यक है। इसी प्रकार, धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा के साथ-साथ उनके उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि धर्म का किसी सरकार, बोर्ड अथवा संस्था से कितना लेना-देना है, बल्कि यह है कि धर्म और धार्मिक विरासत से जुड़े दायित्वों का निर्वहन कितनी ईमानदारी, संवेदनशीलता और पारदर्शिता से किया जा रहा है। धर्म को सत्ता का उपकरण बनाने के बजाय उसे नैतिकता, सेवा और लोककल्याण की प्रेरणा के रूप में समझने की आवश्यकता है। शासन को धार्मिक आस्था के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और धार्मिक संस्थाओं को भी अपने कार्यों में ऐसी पारदर्शिता रखनी चाहिए, जिससे श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहे।

धर्म आस्था का विषय है, लेकिन धर्म के नाम पर संचालित संस्थाओं का प्रबंधन जवाबदेही का विषय भी है। इन दोनों के बीच संतुलन ही भारतीय लोकतंत्र, संवैधानिक मूल्यों और सनातन सांस्कृतिक परंपरा के हित में है। रमेश कुमार और प्रेम सागर पाण्डेय के साथ विशेष बातचीत इसी विमर्श को आगे बढ़ाने का एक अवसर है—ताकि धार्मिक संस्थाओं की भूमिका, सरकारी जवाबदेही और श्रद्धालुओं के अधिकारों पर सार्थक संवाद हो सके तथा भारत की समृद्ध धार्मिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक गरिमा और विश्वास के साथ पहुंचती रहे।— दिव्य रश्मि
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