- आंकड़ों के आईने में बिहार की धार्मिक संपत्तियों की पड़ताल
रमेश कुमार
बिहार की धरती पर शायद ही कोई ऐसा गांव, कस्बा या शहर हो जहां कोई प्राचीन मंदिर, ठाकुरबाड़ी, मठ, धर्मशाला या धार्मिक न्यास की संपत्ति न हो। कहीं सदियों पुराना शिवालय है, कहीं राम-जानकी ठाकुरबाड़ी, कहीं देवी मंदिर, कहीं मठ और कहीं किसी संत-महंत द्वारा स्थापित धार्मिक संस्था। इन मंदिरों में आस्था है, इतिहास है, संस्कृति है और करोड़ों लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं। लेकिन इन धार्मिक स्थलों के पीछे एक और दुनिया है—जमीन की दुनिया, संपत्ति की दुनिया और उन संपत्तियों की सुरक्षा की दुनिया। सवाल यह है कि भगवान के नाम पर दर्ज इन संपत्तियों की रक्षा कौन करता है? बिहार में इसके लिए एक संवैधानिक-कानूनी व्यवस्था मौजूद है, जिसे बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद के नाम से जाना जाता है। लेकिन आज सवाल यह है कि क्या यह पर्षद वास्तव में भगवान की जमीन का मजबूत रखवाला है या फिर उसकी ताकत अधिकतर फाइलों, नोटिसों और सरकारी कागजों तक सीमित है?

बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद की स्थापना बिहार हिंदू धार्मिक न्यास अधिनियम, 1950 के तहत हुई और इस व्यवस्था ने राज्य के सार्वजनिक हिंदू धार्मिक न्यासों के प्रबंधन, पंजीकरण और संपत्तियों की निगरानी के लिए एक संस्थागत ढांचा तैयार किया। इसका उद्देश्य केवल मंदिरों की पूजा-पद्धति देखना नहीं, बल्कि उन धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति को सुरक्षित रखना भी है जिनकी जमीन और संसाधन समाज और धर्म के सार्वजनिक हित के लिए समर्पित माने जाते हैं। यह व्यवस्था निजी मंदिरों से अलग सार्वजनिक धार्मिक न्यासों के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी एक बुनियादी सवाल जस का तस खड़ा है—क्या जिन मंदिरों और मठों की संपत्ति की रक्षा की जिम्मेदारी व्यवस्था को दी गई थी, उनकी पूरी संपत्ति आज वास्तव में सुरक्षित है?

उपलब्ध कराए गए 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार बिहार में 2,499 पंजीकृत मंदिर-मठों के पास लगभग 18,456 एकड़ जमीन दर्ज है, जबकि 2,512 अपंजीकृत मंदिर-मठों से संबंधित लगभग 4,321 एकड़ जमीन का भी उल्लेख किया गया है। इस प्रकार कुल चिन्हित धार्मिक संस्थाओं की संख्या 5,777 और संबंधित भूमि लगभग 28,672 एकड़ बताई जाती है। यदि इन आंकड़ों को आधार माना जाए तो सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि बड़ी संख्या में धार्मिक संस्थाएं अभी भी पंजीकरण की औपचारिक व्यवस्था से बाहर हैं। यही वह स्थान है जहां से सबसे बड़ा खतरा पैदा होता है, क्योंकि जिस संपत्ति का स्पष्ट संस्थागत रिकॉर्ड, स्वामित्व विवरण, सीमा निर्धारण और प्रबंधन व्यवस्था मजबूत नहीं होगी, वहां अतिक्रमण, अवैध हस्तांतरण, फर्जी दस्तावेज और निजी हितों के लिए उपयोग की आशंका बनी रहेगी।
जरा इस आंकड़े की गंभीरता को समझिए। केवल पंजीकृत मंदिर-मठों से संबंधित 18,456 एकड़ भूमि को ही यदि औसतन 50 लाख रुपये प्रति एकड़ की काल्पनिक दर से आंका जाए तो उसका मूल्य लगभग 9,228 करोड़ रुपये बैठता है। यह बाजार मूल्य का आधिकारिक आकलन नहीं है और वास्तविक कीमत स्थान, भूमि की प्रकृति और स्थानीय बाजार के अनुसार बहुत अलग हो सकती है, लेकिन यह अनुमान इस बात का संकेत जरूर देता है कि धार्मिक न्यासों की जमीन केवल आस्था की संपत्ति नहीं है, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण सार्वजनिक संपत्ति है। और जब इतनी बड़ी संपत्ति की बात हो रही हो तो उसकी सुरक्षा केवल किसी महंत, पुजारी या स्थानीय प्रबंधक के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।
उपलब्ध आंकड़ों में पंजीकृत मंदिरों की संख्या के मामले में सारण, मुजफ्फरपुर, मधुबनी, पटना और पूर्वी चंपारण जैसे जिले प्रमुख दिखाई देते हैं। इसका अर्थ है कि धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा का प्रश्न केवल किसी एक शहर का प्रश्न नहीं, बल्कि पूरे बिहार के ग्रामीण और शहरी भूगोल से जुड़ा हुआ विषय है। बिहार के 38 जिलों में फैली धार्मिक संपत्तियों का रिकॉर्ड तैयार करना, उसे राजस्व अभिलेखों से मिलाना, वास्तविक कब्जे की स्थिति की जांच करना और विवादित जमीन की पहचान करना अपने आप में एक विशाल प्रशासनिक अभियान है।
यहीं बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।
कानून ने पर्षद को धार्मिक न्यासों के पंजीकरण, प्रबंधन, संपत्ति की निगरानी और न्यास संबंधी विवादों में हस्तक्षेप जैसी महत्वपूर्ण भूमिकाएं दी हैं। सार्वजनिक धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों का रिकॉर्ड रखना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य है। लेकिन कानून में अधिकार होना और जमीन पर उन अधिकारों का प्रभावी इस्तेमाल कर पाना—दो अलग-अलग बातें हैं।
भगवान की जमीन पर यदि किसी भू-माफिया ने कब्जा कर लिया तो बोर्ड नोटिस जारी कर सकता है, प्रशासन से कार्रवाई का अनुरोध कर सकता है और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है; लेकिन जमीन पर जाकर कब्जा हटाने के लिए अंततः राजस्व प्रशासन और पुलिस की आवश्यकता पड़ती है। यहीं वह स्थिति सामने आती है जिसे एक वाक्य में कहा जा सकता है—कानून बोर्ड के पास है, लेकिन जमीन पर कार्रवाई की ताकत प्रशासन के पास है।
यही कारण है कि धार्मिक न्यास पर्षद की वास्तविक सफलता का मूल्यांकन उसके कार्यालय में मौजूद फाइलों की संख्या से नहीं, बल्कि जमीन पर सुरक्षित कराई गई संपत्तियों से होना चाहिए।
यदि कोई मंदिर वर्षों से अतिक्रमण में है, यदि उसकी जमीन पर किसी व्यक्ति ने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है, यदि राजस्व रिकॉर्ड में धार्मिक संस्था का नाम गायब हो गया है या यदि किसी पुराने महंत या प्रबंधक द्वारा जमीन का कथित रूप से गलत हस्तांतरण कर दिया गया है, तो केवल पत्राचार पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि आखिर जमीन वापस कब मिलेगी?
बिहार में धार्मिक संपत्तियों को लेकर सामने आए कुछ मामलों से यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल कागजी नहीं है। पटना के कबीर मठ से जुड़ी जमीन पर कब्जे और कथित बिक्री के मामले में बोर्ड द्वारा प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग किए जाने की बात सामने आती है। सिंहेश्वर मंदिर, मधेपुरा से जुड़ी जमीन पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का उल्लेख मिलता है। मुजफ्फरपुर के राम-जानकी ठाकुरबाड़ी से संबंधित भूमि की मापी कर अतिक्रमण चिह्नित किए जाने की जानकारी भी सामने आती है। इन मामलों की प्रकृति और वर्तमान स्थिति का स्वतंत्र दस्तावेजी सत्यापन आवश्यक है, लेकिन ये उदाहरण एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करते हैं—धार्मिक न्यास की जमीन को लेकर विवाद और अतिक्रमण की समस्या वास्तविक है और इसे केवल धार्मिक भावना का विषय मानकर छोड़ना संभव नहीं है।
पूर्व अध्यक्ष किशोर कुणाल के कार्यकाल में धार्मिक संपत्तियों को अतिक्रमण से मुक्त कराने के प्रयासों का भी उल्लेख मिलता रहा है। यदि वास्तव में हजारों एकड़ धार्मिक भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने की कार्रवाई हुई है तो वह महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन उपलब्धियों का वास्तविक मूल्यांकन तभी होगा जब प्रत्येक मामले में यह स्पष्ट हो कि कितनी जमीन पर कब्जा था, किसके कब्जे में थी, कितनी भूमि वापस मिली, कितने मामले अदालत में हैं और कितने मामलों में राजस्व रिकॉर्ड वास्तव में धार्मिक न्यास के नाम दुरुस्त किया गया।
यही पारदर्शिता आज सबसे अधिक आवश्यक है।
क्योंकि भगवान की जमीन के मामले में केवल “कार्रवाई की गई” कहना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि कार्रवाई का परिणाम क्या हुआ।
किस जमीन पर कब्जा था?
किसने कब्जा किया था?
किस अधिकारी ने कार्रवाई की?
कितने समय में जमीन वापस मिली?
आज जमीन किसके नाम दर्ज है?
क्या उसका सीमांकन हो चुका है?
क्या भविष्य में अतिक्रमण रोकने की व्यवस्था है?
यदि ये सूचनाएं सार्वजनिक हो जाएं तो धार्मिक न्यास पर्षद की कार्यप्रणाली पर विश्वास और मजबूत होगा।
हाल के वर्षों में सरकार की ओर से धार्मिक न्यासों के पंजीकरण और संपत्तियों के रिकॉर्ड को अधिक व्यवस्थित करने पर जोर दिया गया है। यदि सभी अपंजीकृत मंदिरों और मठों का पंजीकरण कराया जाता है और उनकी जमीन का रिकॉर्ड राजस्व अभिलेखों के साथ डिजिटल रूप से जोड़ा जाता है तो यह बिहार की धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। लेकिन डिजिटल रिकॉर्ड तभी उपयोगी है जब वह वास्तविक जमीन से मेल खाता हो। कंप्यूटर में 100 एकड़ जमीन किसी मंदिर के नाम दर्ज हो और जमीन पर उसका कब्जा 60 एकड़ पर भी न हो तो डिजिटल रिकॉर्ड समस्या का समाधान नहीं, केवल समस्या का डिजिटल रूप बनकर रह जाएगा।
इसलिए अब बिहार को केवल “डिजिटल धार्मिक संपत्ति रजिस्टर” नहीं चाहिए, बल्कि डिजिटल रिकॉर्ड के साथ ग्राउंड वेरिफिकेशन चाहिए।
हर मंदिर की जमीन का GPS आधारित सीमांकन हो। हर खेसरा नंबर का सत्यापन हो। राजस्व रिकॉर्ड, न्यास रिकॉर्ड और वास्तविक भौतिक कब्जे का मिलान हो। विवादित भूमि को अलग श्रेणी में रखा जाए। अतिक्रमित भूमि की सूची सार्वजनिक की जाए। और सबसे महत्वपूर्ण—किस जमीन पर क्या कार्रवाई हुई, उसका स्टेटस भी ऑनलाइन उपलब्ध हो।
तभी जनता यह समझ पाएगी कि धार्मिक न्यास पर्षद केवल रिकॉर्ड बना रहा है या वास्तव में भगवान की जमीन बचा भी रहा है।
धार्मिक संपत्ति की सुरक्षा का एक दूसरा पहलू भी है—मंदिरों का प्रबंधन। मंदिर में आने वाला दान, दानपेटी की राशि, जमीन से मिलने वाली आय, किराया, लीज और अन्य स्रोतों से प्राप्त धन का हिसाब भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि मंदिर के पास जमीन है लेकिन उससे होने वाली आय का पारदर्शी लेखा-जोखा नहीं है तो संपत्ति सुरक्षा अधूरी है। मंदिर की जमीन बच गई लेकिन उसकी आय का हिसाब गायब हो गया तो भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ।
इसी प्रकार पुजारियों की स्थिति भी धार्मिक न्यास व्यवस्था की गंभीर परीक्षा है। बड़े मंदिरों में यदि व्यवस्थित वेतन और सुविधाएं उपलब्ध हैं तो अच्छी बात है, लेकिन छोटे मंदिरों में काम करने वाले पुजारियों की आर्थिक स्थिति पर भी ध्यान देना होगा। जो व्यक्ति दिन-रात मंदिर की सेवा करता है, उसकी आजीविका सम्मानजनक होनी चाहिए। धार्मिक संपत्ति की रक्षा केवल जमीन बचाने से नहीं होगी; उस व्यवस्था से जुड़े लोगों की गरिमा और सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी।
आज बिहार में धार्मिक न्यास पर्षद के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह खुद को केवल एक नियामक कार्यालय से आगे ले जाए। उसे एक ऐसी संस्थागत व्यवस्था बनानी होगी जिसमें धार्मिक संपत्ति का पूरा जीवन-चक्र दर्ज हो—मंदिर कब स्थापित हुआ, न्यास का स्वरूप क्या है, कितनी जमीन है, जमीन किस खेसरा में है, वर्तमान कब्जा किसका है, उससे कितनी आय होती है, कौन प्रबंधन कर रहा है, दान कितना आता है, खर्च कितना होता है, ऑडिट कब हुआ और कोई विवाद है तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है।
यदि यह जानकारी सार्वजनिक हो जाए तो न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि भू-माफिया और निजी स्वार्थ से जुड़े लोगों के लिए धार्मिक संपत्ति पर कब्जा करना भी कठिन होगा।
और यहीं बिहार सरकार को एक बड़ा कदम उठाना चाहिए।
बिहार के प्रत्येक सार्वजनिक मंदिर और धार्मिक न्यास की संपत्ति का एक सार्वजनिक “डिजिटल प्रॉपर्टी कार्ड” बनाया जाना चाहिए।
उसमें मंदिर का नाम, पंजीकरण संख्या, जिला, अंचल, मौजा, खेसरा संख्या, कुल रकबा, वर्तमान उपयोग, अतिक्रमण की स्थिति, आय का स्रोत और मुकदमे की स्थिति जैसी जानकारी होनी चाहिए। जिस संपत्ति का रिकॉर्ड सार्वजनिक होगा, उस पर कब्जा करना अपेक्षाकृत कठिन होगा।
आज सबसे बड़ा खतरा यही है कि बहुत-सी धार्मिक संपत्तियां भावनाओं से तो जुड़ी हैं, लेकिन रिकॉर्ड और प्रशासनिक निगरानी से उतनी मजबूती से नहीं जुड़ी हैं।
भगवान के नाम पर जमीन छोड़ देना पर्याप्त नहीं है।
भगवान की जमीन को कागज पर भगवान की जमीन बनाए रखना भी जरूरी है और जमीन पर भी।
यहां बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद की भूमिका निर्णायक हो जाती है। पर्षद को केवल नोटिस जारी करने वाली संस्था नहीं, बल्कि धार्मिक संपत्तियों के संरक्षण की अग्रिम पंक्ति की संस्था बनना होगा। इसके लिए राजस्व विभाग, जिला प्रशासन, पुलिस, निबंधन विभाग और स्थानीय निकायों के साथ एकीकृत व्यवस्था आवश्यक है। किसी धार्मिक न्यास की जमीन की बिक्री, हस्तांतरण, लीज या स्वरूप परिवर्तन से पहले डिजिटल सिस्टम में स्वतः अलर्ट उत्पन्न हो—ऐसी व्यवस्था भविष्य में कई विवादों को जन्म लेने से पहले रोक सकती है।
यदि किसी मंदिर की जमीन का कोई संदिग्ध दस्तावेज रजिस्ट्री के लिए प्रस्तुत होता है तो सिस्टम को यह संकेत देना चाहिए कि संबंधित जमीन धार्मिक न्यास की संपत्ति है और संबंधित प्राधिकरण की अनुमति आवश्यक है।
यही आधुनिक शासन है।
केवल फाइलों में लिखे आदेश नहीं, बल्कि जमीन की रक्षा करने वाली तकनीक।
बिहार में धार्मिक संपत्तियों का सवाल केवल हिंदू धार्मिक आस्था का सवाल नहीं है। यह सार्वजनिक संपत्ति, सांस्कृतिक विरासत, प्रशासनिक पारदर्शिता और कानून के शासन का भी प्रश्न है। जिस जमीन को समाज ने धर्म और लोककल्याण के लिए समर्पित किया है, उसका उपयोग निजी संपत्ति की तरह नहीं हो सकता। वह किसी व्यक्ति, परिवार या महंत की निजी जागीर नहीं है। वह एक सार्वजनिक धार्मिक न्यास की संपत्ति है और उसकी रक्षा समाज तथा कानून दोनों की जिम्मेदारी है।
इसलिए अब समय आ गया है कि बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद अपने काम का सार्वजनिक रिपोर्ट कार्ड जारी करे।
कितने मंदिर पंजीकृत हैं?
कितने अभी भी अपंजीकृत हैं?
कितनी जमीन दर्ज है?
कितनी जमीन अतिक्रमण में है?
कितनी जमीन मुक्त कराई गई?
कितने मामले अदालत में लंबित हैं?
कितने मामलों में राजस्व रिकॉर्ड सुधारा गया?
कितने मंदिरों का ऑडिट हुआ?
कितने मामलों में वित्तीय अनियमितता मिली?
और सबसे महत्वपूर्ण—पिछले पांच वर्षों में धार्मिक न्यासों की कितनी संपत्ति वास्तव में सुरक्षित की गई?
इन सवालों के जवाब जनता को मिलना चाहिए।
क्योंकि धार्मिक न्यास पर्षद जनता से अलग कोई संस्था नहीं है। वह जिस संपत्ति की रक्षा करता है, उसका सामाजिक चरित्र सार्वजनिक है। इसलिए उसकी कार्यप्रणाली भी सार्वजनिक जांच के योग्य है।
बिहार में यदि हजारों एकड़ धार्मिक भूमि वास्तव में धार्मिक न्यासों के नाम दर्ज है तो यह एक विशाल विरासत है। इसकी बाजार कीमत चाहे जितनी हो, इसका सांस्कृतिक मूल्य उससे कहीं अधिक है। एक प्राचीन मंदिर की जमीन केवल जमीन नहीं होती। वह इतिहास होती है, परंपरा होती है, आस्था होती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत होती है।
इसलिए उस जमीन पर किसी भू-माफिया की नजर पड़ना केवल एक भू-विवाद नहीं है। यह हमारी सांस्कृतिक विरासत पर हमला है।
लेकिन इसका समाधान भावनात्मक नारों से नहीं होगा।
समाधान होगा—रिकॉर्ड से, सीमांकन से, पारदर्शिता से, तकनीक से और कठोर प्रशासनिक कार्रवाई से।
बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद को अब यह तय करना होगा कि इतिहास उसे किस रूप में याद करेगा—एक ऐसी संस्था के रूप में जिसने भगवान की जमीन का रिकॉर्ड बनाया या ऐसी संस्था के रूप में जिसने वास्तव में भगवान की जमीन बचाई।
क्योंकि आज स्थिति को एक प्रतीकात्मक वाक्य में कहा जा सकता है—
भगवान की संपत्ति का रिकॉर्ड बोर्ड के पास है, लेकिन जमीन पर कब्जे के खिलाफ अंतिम कार्रवाई की ताकत जिला प्रशासन के पास है।
यानी भगवान के पास जमीन है, बोर्ड के पास कानून है और प्रशासन के पास कार्रवाई की ताकत।
अब इन तीनों को एक साथ काम करना होगा।
वरना आने वाली पीढ़ियां यह पूछेंगी कि जब हमारे पास हजारों एकड़ धार्मिक भूमि थी, कानून था, बोर्ड था, अधिकारी थे और सरकार थी—तो फिर भगवान की जमीन बच क्यों नहीं सकी?
और यदि सरकार तथा धार्मिक न्यास पर्षद आज की चुनौती को गंभीरता से लेते हैं, सभी धार्मिक संपत्तियों का वास्तविक डिजिटल सर्वे कराते हैं, अतिक्रमण की सार्वजनिक सूची बनाते हैं, राजस्व रिकॉर्ड दुरुस्त करते हैं, दान और आय का ऑडिट सुनिश्चित करते हैं और प्रत्येक विवादित जमीन के मामले में समयबद्ध कार्रवाई करते हैं, तो बिहार देश के सामने धार्मिक संपत्ति संरक्षण का एक प्रभावी मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
आखिर भगवान को अपने मंदिर की जमीन बचाने के लिए अदालतों और दफ्तरों के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।
भगवान की जमीन समाज ने धर्म को दी है। उसकी रक्षा राज्य की जिम्मेदारी है।
अब देखना यह है कि बिहार धार्मिक न्यास पर्षद इस जिम्मेदारी को कितनी गंभीरता से निभाता है।
क्योंकि सवाल केवल जमीन का नहीं है।
सवाल आस्था की संपत्ति का है।
सवाल सार्वजनिक विश्वास का है।
सवाल हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का है।
और अंततः सबसे बड़ा सवाल यही है—
बिहार धार्मिक न्यास पर्षद भगवान की जमीन का वास्तविक रखवाला बनेगा या हार्डिंग रोड की फाइलों में सिमटा एक और कागजी शेर बनकर रह जाएगा?
— संपादकीय
दिव्य रश्मि
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8


0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews