वह लड़की हरसिंगार-सी

वह लड़की हरसिंगार-सी

कुमार महेंद्र
बिन श्रृंगार सँवरती है,
सादगी में निखरती है।
मन के सूने आँगन में,
सुरभि बनकर बिखरती है।
ओस-स्नात पंखुड़ियों-सी,
भोर की प्रथम फुहार-सी।
वह लड़की हरसिंगार-सी।।


रूप-रंग का गर्व नहीं,
मन में कोई विकार नहीं।
अधरों पर सौम्य मुस्कान,
बातों में अहंकार नहीं।
नयनों में सागर-सी गहराई,
प्रीत की निर्मल धार-सी।
वह लड़की हरसिंगार-सी।।


उसकी सादगी के आगे,
फीके पड़ते सोलह श्रृंगार।
रूप-सौंदर्य के उपमान भी,
मानें उसके रूप से हार।
चाल में लय, वाणी में माधुर्य,
शालीनता की मिसाल-सी।
वह लड़की हरसिंगार-सी।।


प्रणय-वसंत बन महक उठी,
मेरे जीवन-उपवन में।
प्रेम-सुधा बन घुलती जाती,
मेरे मन के कण-कण में।
मन-मंदिर में बसी हुई,
प्रीत की मूरत साकार-सी।
वह लड़की हरसिंगार-सी।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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