निशि की नीरव बेला में, बस तुम्हारी ही स्मृतियों का मेला

निशि की नीरव बेला में, बस तुम्हारी ही स्मृतियों का मेला

कुमार महेंद्र
शीतल पवन छुए जब तन को,
महके मन का कोना-कोना।
तेरे स्पर्श की सुधि जग उठती,
मन में प्रीत जगाए सोना।
नयन मूँद लूँ, तुम्हें निहारूँ,
खोलूँ नयन, जग लगे अकेला।
निशि की नीरव बेला में,
बस तुम्हारी ही स्मृतियों का मेला।।


चाँद गगन में छटा बिखेरे,
तारे झिलमिल दीप जलाएँ।
मेरे मन के सूने उपवन में,
तेरी यादें फूल खिलाएँ।
रजनी के आँचल में सजता,
प्रेम हमारा अलबेला।
निशि की नीरव बेला में,
बस तुम्हारी ही स्मृतियों का मेला।।


ऋतुएँ बदलें, वर्ष बदल जाएँ,
प्रेम न अपना रूप बदले।
समय भले ही राह बदल दे,
मन का दीप कभी न बुझे।
तेरी प्रीति हृदय में बसकर,
हर पल लाए वसंत नवेला।
निशि की नीरव बेला में,
बस तुम्हारी ही स्मृतियों का मेला।।


दूर क्षितिज के पार रहो तुम,
मन का बंधन टूट न पाए।
साँस-साँस में नाम तुम्हारा,
धड़कन-धड़कन गीत सुनाए।
तुम भोर की पहली किरण हो,
मैं ओस-बिंदु-सा चमकीला।
निशि की नीरव बेला में,
बस तुम्हारी ही स्मृतियों का मेला।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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