मातृ संस्कार पुत्री आचार

मातृ संस्कार पुत्री आचार

अरुण दिव्यांश
मातृ संस्कार पुत्री आचार ,
न हो दादा दादी लाचार ।
तभी हो परिवार सुखमय ,
यही है सच्चा सुख प्यार ।।
इसीसे परिवार निखरता ,
इस बिन बिखरे परिवार ।
इसी से समाज है बनता ,
गले में पड़ता वही हार ।।
पुष्प व शूल संग संग होते ,
चुन सको उसको लो चुन ।
जितना तू अन्यों को देगा ,
तुझे मिलेगा उसका दून ।।
पुत्री परिचय परिजन का ,
पुत्री से झलकता संस्कार ।
जैसा मिला संस्कार माॅं से ,
वैसा बढ़े उसका संसार ।।
माॅं ही संस्कृति गरिमा यह ,
माॅं ही संस्कृति का आधार ।
ये धन काला या सच्चा धन ,
जिसपे आधारित व्यवहार ।।
व्यवहार से मिलता आशीष ,
व्यवहार से मिले अभिशाप ।
संस्कार कारण पुण्य मिलते ,
संस्कार कारण मिलते पाप ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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