माटी की पुकार
अरुण दिव्यांशहै धरती का यह चीत्कार ,
सुन लो माटी की पुकार ।
रहा दुश्मन अब ललकार ,
रहो लड़ने को तू तैयार ।।
कैसा विधि है सृजनहार ,
भ्रात निकला तेरा गद्दार ।
छिपा चाॅंद जैसे बादल में ,
कर रहा हमें है शर्मसार ।।
राष्ट्र पावन गंगा की धारा ,
जिसमें जैसे गंदा नाला ।
दीखने में है साफ सुथरा ,
कर लिए कपट प्याला ।।
मछली पे है घात लगाए ,
बगुला भगत कंठीमाला ।
बाहर जितना खूबसूरत ,
अंदर उतना ही है काला ।।
उल्टी चलने न दे बयार ,
उल्टी बहने न दे तू धार ।
समझा उसे ऐसी सबक ,
कर घर में ही तिरस्कार ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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