शस्त्र दिवस के अवसर पर आर्य मित्र मंडल एनसीआर द्वारा किया गया भोजशाला में विशेष यज्ञ : डॉ आर्य बोले- भोजशाला को किया जाए राष्ट्रीय स्मारक घोषित

शस्त्र दिवस के अवसर पर आर्य मित्र मंडल एनसीआर द्वारा किया गया भोजशाला में विशेष यज्ञ : डॉ आर्य बोले- भोजशाला को किया जाए राष्ट्रीय स्मारक घोषित

धार नगरी। यहां स्थित भोजशाला में शस्त्र दिवस अर्थात विजयादशमी के पावन अवसर पर आर्य मित्र मंडल एवं आर्य प्रतिनिधि सभा जनपद नोएडा के संयुक्त तत्वावधान में एक विशेष यज्ञ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश की न्याय सभा के प्रधान न्यायाधीश और इतिहासकार डॉ राकेश कुमार आर्य ने कहा कि अपने समय में राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए संपूर्ण राष्ट्र के शौर्य और पराक्रम का प्रतिनिधित्व करते हुए सालार मसूद जैसे विदेशी आक्रमणकारी की सेना को बहराइच में जाकर मार काटकर समाप्त करने में अपना महत्वपूर्ण और वंदनीय योगदान दिया। उन्होंने कहा कि राजा भोज जैसे पराक्रमी शासको के कारण ही सनातन को बचाने में हमें सफलता मिली है। उन्होंने सालार मसूद के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि उस समय राजा भोज ने अपने साथ लगभग डेढ़ दर्जन राजाओं का सहयोग प्राप्त कर राष्ट्रीय सेना का गठन किया था। जिसे लेकर उस समय के बहराइच के राजा सुहेलदेव की सहायता की गई थी। उस सेना ने सालार मसूद की 11 लाख की सेना को काटकर समाप्त कर दिया था। डॉ आर्य ने कहा कि 1935 में आर्य समाज और हिंदू महासभा ने साथ मिलकर इस भोजशाला को मुक्त कराने के लिए आंदोलन चलाया था। आर्य समाज आज भी सनातन धर्मी हिंदुओं के साथ खड़ा है और भविष्य में भी खड़ा रहेगा।
उन्होंने कहा कि राजा भोज ने अपना पराक्रम और शौर्य दिखाते हुए शासन किया। उनके समय में विदेशी आक्रांताओं ने कई आक्रमण किये, परंतु उन्होंने उन सबको धूल चटाने का काम किया। उन्होंने विक्रमादित्य की न्याय परंपरा का पालन किया। 84 पुस्तकों का लेखन कार्य किया। अनेक विद्वानों को अपने राज्य में संरक्षण प्रदान किया। 48 वर्ग किलोमीटर की परिक्रमा में उन्होंने उस समय का विश्वविद्यालय का खड़ा किया। जिसमें भारतीय वैदिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए विदेश से भी लोग आया करते थे। उनका जीवन सत्य शिक्षा और न्याय के लिए समर्पित रहा ऐसे राजाओं की परंपरा विश्व में अन्यत्र मिलना कठिन है। परमार वंश के राजाओं ने भारत पर सन 800 ई से लेकर 1305 ई तक कुल 505 वर्ष तक शासन किया, परंतु हम मुगलों के मानसिक गुलाम आज तक बने हुए हैं। जिनके 200 वर्ष के शासन को भी महिमा मंडित किया जाता है। जबकि भारतीय परंपरा के अनुसार राष्ट्र धर्म का पालन करने वाले राजाओं की उपेक्षा की जाती है। उन्होंने बताया कि 1552 ईस्वी में यहां पर राजपूत राजा मेदिनी राय ने अपने राष्ट्रभक्त देशवासियों का सहयोग करते हुए इस पवित्र भूमि को मुक्त कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। परंतु राजा ने भूमि को मुक्त करने के बाद 900 मुसलमानों को यहीं कैद में डाल दिया और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी एक मुसलमान को ही सौंप दी। जिसने गद्दारी करते हुए 25 मार्च 1552 को उन सभी कैदियों को मुक्त कर दिया।
डॉ आर्य ने कहा कि राजा भोज ने अपने पराक्रम को दिखाते हुए ही गांगेय देव और जय सिंह द्वितीय जैसे गांगेय क्षेत्र और तैलंग देश के राजाओं को पराजित करने में सफलता प्राप्त की थी।
उत्तर प्रदेश व फरीदाबाद एनसीआर से चलकर आए इस प्रतिनिधि मंडल के नेता डॉ आर्य ने कहा कि यह भोजशाला तुम्हारे अनेक वीर वीरांगनाओं के पराक्रम शौर्य और बलिदान की गाथा को समेटे हुए हैं। आज हम उन हजारों वीर वीरांगनाओं को समस्त आर्य जगत की ओर से अपनी भावपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जिन्होंने देश धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए समय-समय पर भारत की बलिदानी परंपरा का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने भोजशाला को एक पवित्र राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित करने की भारत सरकार से मांग की और कहा कि यहां पर राजा भोज की आदमकद प्रतिमा स्थापित कर उनका गौरवशाली इतिहास उल्लेखित किया जाना चाहिए।
इस कार्यक्रम के आयोजक संयोजक रहे डॉ देवेंद्र सिंह आर्य ने कहा कि धर्म नगरी को ऐतिहासिक महत्व दिलाने के लिए प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को विशेष कदम उठाने चाहिए। यदि इस संबंध में प्रचलित नियम प्रक्रिया में कोई संशोधन करने की आवश्यकता हो तो वह भी किया जाए। क्योंकि ऐसे ऐतिहासिक स्मारक स्थलों से हमारी आने वाली पीढ़ी प्रेरणा प्राप्त कर सकती है। उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में राजा भोज का विशेष योगदान है ,परंतु जालिम इतिहासकारों ने जानबूझकर उनके इतिहास को भारतीय इतिहास की परंपरा से मिटा दिया है। इस पर हम सबको मिलकर सामूहिक प्रयास करने चाहिए।
डॉ देवेंद्र सिंह ने कहा कि 1301 ईसवी में अलाउद्दीन खिलजी ने यहां आकर 1200 विद्यार्थियों को मार डाला था। आज हम अपने उनवीर सपूतों को भी स्मरण करते हैं जिन्होंने चोटी कटवाने से इनकार कर दिया था, परंतु अपना बलिदान देकर मां भारती की अनुपम सेवा की थी। इसी प्रकार अनेक अवसरों पर लगभग 700 वर्ष के कालखंड में हमारे अनेक वीर वीरांगनाओं ने अपना बलिदान दिया । आज विजयादशमी के दिन हम उन सब का पावन स्मरण करते हैं और अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
कार्यक्रम के संचालक भाषा प्रचारिणी सभा नोएडा के अध्यक्ष ब्रह्मचारी आर्य सागर ने कहा कि आज जिस पवित्र स्थल पर हमने यज्ञ किया है यह वह स्थान है जिस पर कभी वैदिक ऋषियों के द्वारा वैदिक विधि विधान से यज्ञ आदि कार्यक्रम संपन्न किए जाते थे। हम सब के लिए यह गौरव का विषय है कि आज सैकड़ो वर्ष पश्चात यहां पर वेदों के मन्त्रों का उच्चारण हो रहा है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार राजा भोज की विखंडित भोजशाला आज हमें दिखाई दे रही है उसको देखने से स्पष्ट होता है कि यहां पर कभी हमारे वैदिक विद्वानों के द्वारा विधि विधान से यज्ञ संपन्न किए जाते थे। राजा भोज एक वैदिक विद्वान थे। जिन्होंने हिंदू धर्म ग्रंथो में चल रही मिलावट को रोकने के लिए भी गंभीर प्रयास किये थे। ऐसे राजा से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह यज्ञ में किसी प्रकार की आ गई गिरावट को मान्यता प्रदान करते। उनके द्वारा अपने समय में इतना विशाल विश्वविद्यालय तैयार करना उनकी भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा को प्रकट करता है।
इस यज्ञ के ब्रह्मा आचार्य दशरथ कुमार रहे। जबकि यज्ञ के यज्ञमान डॉ धर्म प्रकाश आर्य बनाए गए। जिन्होंने वेद की ऋचाओं का सुंदर शैली में बखान किया और लोगों से आग्रह किया कि वह देश धर्म की रक्षा के लिए राजा भोज के जीवन से प्रेरणा प्राप्त करें। उन्होंने कहा कि राजा भोज के बारे में आज तक अनेक प्रकार की लोक कथाएं प्रचलित हैं। जिनसे पता चलता है कि वह अपने काल में बहुत लोकप्रिय शासक रहे थे। उनकी न्याय शैली का अनुकरण यदि आज की न्याय प्रणाली करे तो निश्चित रूप से जनता को शीघ्र सस्ता और सुलभ न्याय मिल सकता है। वैदिक विद्वान और यात्री दल से वरिष्ठ सदस्य डॉक्टर धर्म प्रकाश आर्य ने कहा कि हमें अपनी वैदिक मान्यताओं के प्रति श्रद्धा रखने वाले अपने पूर्वजों के प्रति विशेष परिश्रम और पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है। क्योंकि ऐसे परिश्रम और पुरुषार्थ से ही हम उनको इतिहास में उचित स्थान दिलाने का काम कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि परमार वंशी राजा भोज आज भी क्षत्रिय समाज के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं।
इस कार्यक्रम में भोजशाला के लिए चलाये गये मुक्ति संग्राम के संयोजक पंडित गोपाल शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किये और उसके लिए चलाए गए आंदोलन की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने यात्री दल को विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि मुसलमानों के द्वारा यहां लोगों पर अनेक प्रकार के अत्याचार किए गए और हमारे वीरों ने उन अत्याचारों का सामना करते हुए अपने बलिदान दिए। उन्होंने कहा कि वीरांगनाओं ने भी जौहर करके अपनी वीरता का परिचय दिया और हिंदू धर्म को न त्याग कर एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने यात्री दल को उन प्रमाणों का निरीक्षण करवाया जिनको आधार बना कर माननीय उच्च न्यायालय मध्य प्रदेश ने भोजशाला को विगत 15 मई 2026 को अपना ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए एक हिंदू मंदिर के रूप में घोषित किया। सारे परिसर का यात्री दल ने बड़ी गंभीरता से निरीक्षण परीक्षण किया। यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि पंडित गोपाल शर्मा जी स्वयं भी भोजशाला मुक्ति संग्राम समिति से जुड़े रहे हैं और इस को मुक्त कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस बात को जानकर सभी हतप्रभ रह गए कि यहां पर पुरातत्व विभाग द्वारा किए गए सर्वेक्षण के समय हिंदू मंदिरों के होने के अनेक स्पष्ट प्रमाण मिले। अनेक मूर्तियां प्राप्त हुईं। जिन्हें देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सारा परिसर गुर्जर परमार वंशी राजा भोज के द्वारा ही निर्मित किया गया था। ज्ञात रहे कि गुर्जर समाज प्राचीन काल से ही एक देशभक्त समाज रहा है। जिसने वास्तव में ही क्षत्रिय समाज का प्रतिनिधित्व किया है । इसके राजाओं ने अपना पराक्रम और शौर्य दिखाते हुए अनेक विदेशी आक्रांताओं का सफलतापूर्वक सामना किया है । लड़ते-लड़ते रण क्षेत्र में अपने बलिदान दिए हैं ,परंतु कभी किसी विदेशी आक्रमणकारी के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया। कार्यक्रम में महावीर सिंह आर्य,डॉक्टर युद्धवीर सिंह आर्य,वेद प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष विजेंद्र सिंह आर्य, कमल सिंह आर्य, गजराज सिंह आर्य,हेम सिंह आर्य, लखन कुमार ठाकुर, अमरजीत सिंह, जितेंद्र कुमार विकल, राजीव विकल्, आर्य बेगराज नागर ,रामपाल शास्त्री , प्रेम विधूड़ी, डॉ एस के आर्य, वीरेंद्र कुमार गुप्ता, पंडित धर्मवीर आर्य मंत्री, डॉ सत्यपाल आर्य, राजेंद्र सिंह, परमानंद आर्य, मनु देव आर्य , मास्टर कृपाल सिंह आर्य आदि सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
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