राजभवन में उर्दू सामवेद विमोचन पर विवाद: मुफ्त वितरण के वादे के बाद ₹3000 में बिक्री की तैयारी पर उठे सवाल, पुनर्विचार की मांग

राजभवन में उर्दू सामवेद विमोचन पर विवाद: मुफ्त वितरण के वादे के बाद ₹3000 में बिक्री की तैयारी पर उठे सवाल, पुनर्विचार की मांग

पटना:

बिहार के राजभवन में आगामी 5 नवंबर को प्रस्तावित 'उर्दू सामवेद' के विमोचन समारोह को लेकर नया प्रशासनिक व सार्वजनिक विवाद खड़ा हो गया है। 'नागरिक अधिकार मंच' ने इस आयोजन के व्यावसायिक स्वरूप और सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। मंच का आरोप है कि पहले अतिथियों को पुस्तक निःशुल्क भेंट करने की बात कहकर आमंत्रित किया गया था, लेकिन अब उसी कार्यक्रम स्थल पर इस निजी पुस्तक को ₹3,000 में बेचे जाने की योजना बनाई जा रही है।

नागरिक अधिकार मंच के महासचिव रमेश कुमार चौबे ने एक विस्तृत बयान जारी कर राजभवन की गरिमा, जनता के टैक्स के पैसे के उपयोग और इस पूरे आयोजन की पारदर्शिता पर तीखे सवाल खड़े किए हैं।


मुफ्त उपहार का झांसा देकर सहमति लेने का आरोप

मंच के अनुसार, कुछ दिन पहले तक इस विमोचन समारोह के लिए अतिथियों से संपर्क साधा गया था और यह आश्वस्त किया गया था कि राजभवन आने वाले प्रत्येक अतिथि को यह ग्रंथ उपहार स्वरूप भेंट किया जाएगा। इसी आधार पर गणमान्य व्यक्तियों से उनके पते और कार्यक्रम में शामिल होने की सहमति प्राप्त की गई।

अब अचानक नियमों में बदलाव करते हुए यह बात सामने आ रही है कि कार्यक्रम स्थल पर पुस्तक ₹3,000 के मूल्य पर बेची जाएगी। इसे लेकर मंच ने कड़ा ऐतराज जताते हुए पूछा है कि क्या देश के किसी संवैधानिक पद और उसके परिसर का इस्तेमाल निजी पुस्तक के व्यावसायिक काउंटर के रूप में किया जाना उचित है।


उठाए गए तीन प्रमुख संवैधानिक व नीतिगत सवाल

मंच ने इस मामले को लेकर सीधे तौर पर व्यवस्था और प्रशासनिक नैतिकता से जुड़े तीन अहम प्रश्न उठाए हैं:
  • राजभवन की गरिमा: क्या किसी संवैधानिक परिसर के भीतर किसी निजी प्रकाशन या पुस्तक की व्यावसायिक बिक्री के लिए स्टॉल या काउंटर लगाना पद और स्थान की मर्यादा के अनुकूल है?

  • जनता के धन का दुरुपयोग: राजभवन में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सुरक्षा, चाय-नाश्ता, बैठक व्यवस्था और अन्य लॉजिस्टिक्स का पूरा व्यय राज्य सरकार के खजाने यानी जनता के टैक्स के पैसे से वहन होता है। क्या सरकारी खर्च पर किसी निजी पुस्तक या प्रकाशक का व्यावसायिक प्रचार-प्रसार करना न्यायोचित है?

  • कीमत और जनहित का औचित्य: सामवेद का मूल संस्कृत और हिंदी अनुवाद बाजार में ₹500 से भी कम मूल्य पर सहजता से उपलब्ध है। ऐसे में ₹3,000 की अत्यधिक कीमत वाले उर्दू संस्करण का राजभवन जैसे मंच से विमोचन कराने का वास्तविक जनहित क्या है?

राज्यपाल से कार्यक्रम पर पुनर्विचार की अपील

रमेश कुमार चौबे ने स्पष्ट किया कि उनका यह विरोध किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं और व्यवस्था की शुचिता को बनाए रखने के लिए है। उन्होंने कहा कि माननीय राज्यपाल राज्य के संवैधानिक संरक्षक हैं और उनका पद सदैव विवादों से परे और निष्पक्ष रहना चाहिए।
मंच ने राज्यपाल से करबद्ध प्रार्थना की है कि उत्पन्न भ्रम, व्यावसायिक संशय और गरिमा से जुड़े इन सवालों को देखते हुए प्रस्तावित 5 नवंबर के कार्यक्रम पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए, ताकि किसी निजी व्यावसायिक हित के चलते राजभवन की साख पर कोई आंच न आए।
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