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बदलता परिवेश

बदलता परिवेश

तस्वीर बदल रहा है ,
तकदीर बदल रहा है ।
क्या बताऊॅं अब तो ,
तहरीर बदल रहा है ।।
नफरत देखा प्यार में ,
स्वीकार भी इंकार में ।
न्याय भी बदलते देखा ,
संस्कृति मजधार में ।।
बदल रहा है जमाना ,
बदल रहे तो हम हैं ।
हर्ष को हैं पीछे छोड़े ,
बदले में लिए गम हैं ।।
बर्फ को पिघले देखा ,
पाथर पिघल रहा है ।
अग्नि को जलते देखा ,
अब मानव जल रहा है ।।
धरणी आज भी वही ,
अब शृंगार तल रहा है ।
हाय रे मानव कर्म तेरे ,
तू प्रकृति छल रहा है ।।
शेष बना अब विशेष है ,
विशेष बना अवशेष है ।
कैसे तू चल रहा मानव ,
तेरा समय संग रेस है ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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