“कलम का काम सवाल पूछना था, अब शायद रेट पूछना रह गया है!”
- डॉ. राकेश दत्त मिश्र
एक दिन एक पत्रकार महोदय बड़े गर्व से अपना प्रेस कार्ड दिखा रहे थे। मैंने पूछा-
“भाई साहब, पत्रकार हैं?”
बोले-“जी हाँ!”
मैंने पूछा-“क्या करते हैं?”
बोले-“समाचार प्रकाशित करते हैं।”
मैंने फिर पूछा-“और प्रश्न?”
वे थोड़े असहज हुए। बोले-
“प्रश्न? वह तो परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”
मैंने कहा-“कैसी परिस्थितियों पर?”
उन्होंने धीरे से कान के पास आकर कहा-
“विज्ञापन किसका है, खबर किसके खिलाफ है और भुगतान किस तरफ से है... बस इन्हीं परिस्थितियों पर!”
मैंने सोचा-समय बदल गया है।
कभी पत्रकार के हाथ में कलम होती थी, अब कैलकुलेटर भी दिखाई देने लगा है।
पहले पत्रकार पूछता था-
“साहब, यह क्यों हुआ?”
अब शायद पूछता है-
“साहब, इस खबर का बजट कितना है?”
पत्रकारिता का नया गणित
आजकल पत्रकारिता का गणित बड़ा सरल है।
विज्ञापन + संपर्क + सुविधा = खबर
और
सवाल + जांच + तथ्य = परेशानी!
इसलिए समझदार पत्रकार वही है जो परेशानी से दूर रहे।
नेता जी का कार्यक्रम है?
पहले से प्रेस विज्ञप्ति तैयार।
मंत्री जी ने फीता काटा?
शीर्षक तैयार।
अधिकारी जी ने बैठक की?
फोटो तैयार।
उद्योगपति जी ने विज्ञापन दिया?
विशेषांक तैयार।
और जनता?
वह बेचारे अभी भी खबर ढूंढ रहे हैं!
“प्रश्न मत पूछिए, नौकरी चली जाएगी!”
कभी पत्रकारिता का पहला पाठ था-
“सत्य के लिए संघर्ष करो।”
आज शायद नया पाठ है—
“सत्य ऐसा हो जिससे किसी बड़े आदमी को तकलीफ न हो।”
क्योंकि बड़े आदमी को नाराज कर दिया तो विज्ञापन जाएगा।
विज्ञापन गया तो मालिक नाराज होगा।
मालिक नाराज हुआ तो नौकरी जाएगी।
और नौकरी गई तो पत्रकार महोदय को सचमुच पत्रकारिता करनी पड़ेगी!
इसलिए बहुत से लोग नौकरी बचाने के लिए सवाल बचाकर रखते हैं।
वे सवाल पूछते नहीं-
सहेजकर रखते हैं।
कभी कोई सेवानिवृत्त होगा, कभी कोई सत्ता बदलेगी, कभी कोई विज्ञापनदाता बदल जाएगा-तब पूछेंगे!
एक दिन “ब्रेकिंग न्यूज” आई
एक चैनल के संपादक ने रिपोर्टर से कहा-
“कुछ बड़ी खबर लाओ।”
रिपोर्टर बोला-
“सर, एक गरीब की जमीन दबंग ने हड़प ली है।”
संपादक ने पूछा-
“दबंग कौन है?”
“स्थानीय नेता का आदमी।”
“नेता जी का विज्ञापन आता है?”
“जी, हर महीने।”
“तो खबर कितनी बड़ी है?”
रिपोर्टर बोला-
“बहुत बड़ी!”
संपादक ने कहा-
“तो फिर छोटी कर दो।”
रिपोर्टर बोला-
“लेकिन सर, पीड़ित बहुत गरीब है।”
संपादक ने कहा-
“इसीलिए तो छोटी कर दो। गरीब की खबर बड़ी हो गई तो गरीब को लगेगा कि उसकी भी कोई कीमत है!”
रिपोर्टर चुप।
संपादक ने पूछा-
“और नेता जी के कार्यक्रम की फोटो आई?”
“जी।”
“उसे पूरा पन्ना दो।”
“लेकिन उसमें खबर क्या है?”
संपादक मुस्कुराया-
“खबर नहीं है, विज्ञापन की संभावना है!”
पत्रकारिता या “जनसंपर्क विभाग”?
आज सबसे बड़ा सवाल यही है-
पत्रकार और जनसंपर्क अधिकारी में अंतर क्या बचा है?
जनसंपर्क अधिकारी का काम है अपने विभाग की अच्छी तस्वीर प्रस्तुत करना।
पत्रकार का काम है उस तस्वीर के पीछे छिपी वास्तविकता देखना।
लेकिन यदि पत्रकार भी वही तस्वीर दिखाने लगे जो विभाग दिखाना चाहता है, तो फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस और समाचार में अंतर क्या रह जाएगा?
फिर पत्रकार क्यों?
सीधे विभाग से प्रेस विज्ञप्ति मंगाइए, वेबसाइट पर डालिए और काम खत्म!
कैमरा चालू, सवाल बंद!
आज कैमरे के सामने पत्रकार बहुत दिखाई देता है।
लेकिन कैमरा बंद होने के बाद उसका विवेक कहाँ चला जाता है-यह कोई नहीं पूछता।
माइक्रोफोन सामने होता है।
नेता सामने होता है।
अधिकारी सामने होता है।
मुद्दा सामने होता है।
लेकिन सवाल गायब होता है!
कभी-कभी लगता है कि माइक्रोफोन में आवाज तो है, लेकिन सवाल की बैटरी खत्म हो चुकी है।
पत्रकार पूछता है-
“सर, आपकी सरकार की उपलब्धियां क्या हैं?”
नेता जी बताते हैं।
पत्रकार पूछता है-
“बहुत अच्छा काम हुआ है, जनता को क्या संदेश देंगे?”
नेता जी बताते हैं।
पत्रकार पूछता है-
“विपक्ष आपके काम की आलोचना करता है, क्या कहेंगे?”
नेता जी बताते हैं।
फिर पत्रकार धन्यवाद देकर चला जाता है।
और जनता सोचती रह जाती है-
“भाई, सवाल पूछने गए थे या इंटरव्यू लेने?”
असली पत्रकार का दुश्मन कौन?
असली पत्रकार का दुश्मन कोई नेता नहीं है।
न अधिकारी।
न उद्योगपति।
न विज्ञापनदाता।
उसका सबसे बड़ा दुश्मन है-
उसका अपना डर।
वह डर कि-
“कहीं विज्ञापन न चला जाए।”
“कहीं फोन न आ जाए।”
“कहीं मालिक नाराज न हो जाए।”
“कहीं मुकदमा न हो जाए।”
“कहीं संबंध खराब न हो जाए।”
और धीरे-धीरे डर इतना बड़ा हो जाता है कि पत्रकार की कलम छोटी पड़ जाती है।
फिर पत्रकार सोचता है-
“सच लिखकर क्या मिलेगा?”
यहीं से पत्रकारिता हारती है।
लेकिन एक बात याद रखिए...
पत्रकारिता कोई दुकान नहीं है जहाँ खबर की कीमत तय हो।
पत्रकारिता लोकतंत्र की प्रहरी है।
प्रहरी अगर पहरा छोड़कर सो जाए तो चोर को दरवाजा तोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती।
और जब पत्रकार ही प्रश्न पूछना बंद कर दे तो भ्रष्ट व्यवस्था को भ्रष्ट होने के लिए बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ती।
उसे केवल इतना करना होता है-
पत्रकार को चुप रखना।
चंद सिक्कों का सौदा
चंद सिक्कों से शायद एक दिन की जरूरत पूरी हो सकती है।
लेकिन पत्रकारिता की आत्मा की कीमत तय नहीं की जा सकती।
क्योंकि जब एक खबर पैसे लेकर दबाई जाती है, तो केवल एक खबर नहीं दबती।
किसी गरीब की आवाज दबती है।
किसी पीड़ित की उम्मीद दबती है।
किसी भ्रष्टाचार का प्रमाण दबता है।
किसी व्यवस्था की जवाबदेही दबती है।
और अंततः-
जनता का विश्वास दबता है।
यह सौदा बहुत महंगा है।
क्योंकि पैसे लेने वाला शायद कुछ समय बाद उसे भूल जाए,
लेकिन इतिहास नहीं भूलता कि-
जब सच सामने था, तब कौन चुप था।
“साहब, प्रश्न पूछना है!”
कल्पना कीजिए एक दिन कोई पत्रकार किसी बड़े अधिकारी के सामने जाकर कह दे-
“साहब, आज प्रेस विज्ञप्ति नहीं चाहिए।”
अधिकारी चौंकेगा-
“तो?”
पत्रकार बोलेगा-
“आज मैं प्रश्न पूछूंगा।”
अधिकारी कहेगा-
“किस बारे में?”
पत्रकार बोलेगा-
“उस सड़क के बारे में जो हर साल बनती है और हर साल टूट जाती है।”
“उस योजना के बारे में जिसका पैसा खर्च हो गया लेकिन काम दिखाई नहीं देता।”
“उस अस्पताल के बारे में जहाँ भवन है, बोर्ड है, उद्घाटन का पत्थर है-लेकिन डॉक्टर नहीं है।”
“उस स्कूल के बारे में जहाँ नामांकन है, कागज है, भवन है-लेकिन शिक्षा कहाँ है?”
और अंत में पूछे-
“साहब, जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?”
यही पत्रकारिता है।
पत्रकारिता को फिर पत्रकारिता बनने दीजिए
हम पत्रकारों के खिलाफ नहीं हैं।
हम पत्रकारिता को कमजोर करने वालों के खिलाफ हैं।
हम उन पत्रकारों का सम्मान करते हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी सच लिखते हैं।
जो सत्ता से प्रश्न करते हैं।
जो विपक्ष से भी प्रश्न करते हैं।
जो अपने मित्र से भी प्रश्न करते हैं।
जो अपने ही संस्थान से प्रश्न करने का साहस रखते हैं।
क्योंकि पत्रकारिता का अर्थ किसी के खिलाफ होना नहीं है।
पत्रकारिता का अर्थ सत्य के पक्ष में होना है।
आखिरी सवाल पत्रकार से नहीं, समाज से है
आज हम पत्रकार से पूछते हैं-
“आपने सवाल क्यों नहीं पूछा?”
लेकिन शायद हमें खुद से भी पूछना चाहिए-
“हमने सवाल पूछने वाले पत्रकार का साथ कब दिया?”
जब कोई पत्रकार सच लिखता है और हम उसे पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं,
जब कोई पत्रकार भ्रष्टाचार उजागर करता है और हम कहते हैं-
“छोड़िए, कौन पचड़े में पड़े!”
जब कोई पत्रकार सत्ता से सवाल करता है और हम कहते हैं-
“बेचारा अपना करियर खराब कर रहा है।”
तो फिर दोष केवल पत्रकार का नहीं है।
समाज भी जिम्मेदार है।
क्योंकि जिस समाज को सवाल पूछने की आदत नहीं होती, वहाँ सवाल पूछने वाला धीरे-धीरे अकेला पड़ जाता है।
और जब सवाल पूछने वाला अकेला पड़ जाता है-
तो सत्ता बेफिक्र हो जाती है।
व्यवस्था निरंकुश हो जाती है।
भ्रष्टाचार निडर हो जाता है।
और जनता-
मूक दर्शक।
इसलिए पत्रकार महोदय!
कल जब कैमरा उठाइए तो एक बार आईने में भी देख लीजिए।
माइक्रोफोन की आवाज जांचने से पहले अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन लीजिए।
प्रेस कार्ड जेब में रखने से पहले पत्रकारिता का धर्म दिल में रख लीजिए।
और किसी बड़े आदमी के सामने बैठकर सवाल पूछने से पहले यह मत सोचिए-
“इस सवाल से मुझे क्या मिलेगा?”
सिर्फ इतना सोचिए-
“अगर मैंने यह सवाल नहीं पूछा तो समाज क्या खो देगा?”
क्योंकि पत्रकारिता की असली कमाई वेतन, विज्ञापन या पुरस्कार नहीं है।
उसकी असली कमाई है-
जनता का विश्वास।
और याद रखिए-
कलम बिक जाए तो खबर बच सकती है,
लेकिन पत्रकारिता नहीं।
माइक्रोफोन चुप हो जाए तो आवाज बच सकती है,
लेकिन लोकतंत्र नहीं।
और जिस दिन पत्रकार ने प्रश्न पूछना छोड़ दिया—
उस दिन उससे यह पूछना भी व्यर्थ है कि वह पत्रकार क्या है।
क्योंकि फिर वह पत्रकार नहीं,
सिर्फ खबरों का दुकानदार है।
और दुकानदार से पत्रकारिता का धर्म पूछना वैसा ही है-जैसे तराजू से पूछना कि न्याय कितना किलो का होता है!
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