दिल्ली में 3 अक्टूबर को सम्पन्न हुई परिवर्तन योगेश की 38वीं सुदर्शन सभा: डॉ देवेंद्र सिंह आर्य को दिया गया विद्या वाचस्पति सम्मान

नीति आयोग द्वारा मानित राष्ट्र, संस्कृति व समाज हित समर्पित संस्था परिवर्तन योगेश की 38वीं सुदर्शन सभा 3 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में सम्पन्न हुई। यह सभा परिवर्तन योगेश संस्थान के उप संगठन महर्षि सत्य सनातन हिन्दी विद्यापीठ के विद्या वाचस्पति एवं विद्या सागर मानद सम्मान प्रेषण द्वारा सम्पन्न हुई। जिसमें देश की विभिन्न प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया और उन्हें विद्या वाचस्पति और विद्यासागर की मानक उपाधियां प्रदान की गई। इस संबंध में जानकारी देते हुए संस्था के संस्थापक श्री योगेश त्रेहन ने बताया कि इस अवसर पर मुख्य अतिथि रहे -सद्गृहस्थ संत डॉ हरीश मिश्र (राष्ट्रीय अध्यक्ष : परिवर्तन योगेश), डॉ. योगेश तरेहन (संस्थापक - परिवर्तन योगेश), महामंडलेश्वर निरंकार नंद महाराज जी (पीठाधीश्वर : महर्षि सत्य सनातन अखाड़ा), डॉ. प्रशांत मनोहर गायकवाड (तबला वादक एवं ज्योतिषाचार्य) एवं डॉ. रविकुमार द्विवेदी (कुलपति : महर्षि सत्य सनातन हिन्दी विद्यापीठ)।
श्री योगेश ने बताया कि उनकी यह संस्था देश की सनातन संस्कृति के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली प्रतिभाओं को सम्मानित करती रही है। जिससे कि सनातन के सांस्कृतिक मूल्यों को प्रोत्साहन दिया जा सके और जो शक्तियां देश की सनातन संस्कृति के विनाश के कार्यों में लगी हुई हैं उनका सामना किया जा सके। उन्होंने कहा कि श्री कृष्ण जी क्रांति के प्रतीक हैं , उनका सुदर्शन चक्र उन शक्तियों के विध्वंस का प्रतीक है जो राष्ट्र समाज और संस्कृति का विनाश करने का कार्य करती हैं।श्री कृष्ण जी का गीता का उपदेश शाश्वत है । जो प्रत्येक काल के अर्जुन के लिए दिया गया है। आज भी हम सबको अर्जुन के रूप में जागना होगा और अपने कर्तव्य धर्म का निर्वाह करना होगा। हमें यह ध्यान रखना होगा कि क्रांति क्रमिक उन्नति का नाम है। जिसके लिए शांति भी आवश्यक है। क्रांति खून खराबे का नाम नहीं है, जैसा कि हमको बताया गया है। क्रांति शांतिप्रिय लोगों को सुख पूर्वक जीने के साधन उपलब्ध कराने का नाम है। इसलिए हमें यह देखना होगा कि जो लोग आज अराजकता फैला कर देश को राजनीतिक सत्ता के दौर में ले जा रहे हैं एक क्रांति के नहीं बल्कि विध्वंस के प्रतीक हैं और उन सब पर श्री कृष्ण जी का सुदर्शन चक्र चलना चाहिए।

इस सभा में विद्या सागर देश के 3 विद्वानों को दिया गया। जिनके नाम हैं- डॉ. भभुता राम चौहान, डॉ. लोकेश कुमार एवं डॉ यशदेव प्रसाद शर्मा। विद्या वाचस्पति 33 महानुभावों को प्रेषित किया गया, जिनके नाम हैं- संजय हरिहरनाथ त्रिपाठी, प्रमोद तिवारी, शम्भू नाथ दुबे, राहुल कपूर, विजय प्रकाश दीक्षित, प्रभात अग्रवाल, शंकर कुमार मिश्रा, चन्द्र मोहन बाली, यश अवस्थी, महामंडलेश्वर मंजू वर्मा, श्रीमती रेखा मुकुल चौबे, विवेका कुमार सिन्हा, डॉ. जितेन्द्र माधव, कुलजीत सिंह, श्री दर्शन दिलीपराव जोशी, रामेश्वर सिंह शांडिल्य, श्रीमती शुभांगी शांडिल्य, कृष्ण कान्त दूबे, महर्षि श्री राजेन्द्र प्रसाद विश्वकर्मा, प्रकाश चंद्र पंड्या, सुरेश चन्द्र जोशी, डॉ. जितेंद्रकुमार बाबूलाल प्रजापति, शिव शंकर शर्मा, टीकादास मराबी, विनोद राजपूत, देवेन्द्र सिंह आर्य, विष्णु सिकरवार, धनन्जय सिंह, सुंदर पाल यादव, कमलेश कुमार मिश्रा, परमार कुंजलता सुरसिंह, देश दीपक शर्मा एवं पंकज कुमार दीक्षित।
सभा में प्रसिद्ध नृत्यांगना श्रीमती कल्पना शर्मा जी ने कत्थक नृत्य की प्रस्तुति की, उन्हें कला शिरोमणि सम्मान देय हुआ व प्रसिद्ध तबला वादक एवं ज्योतिषाचार्य डॉ. प्रशांत मनोहर गायकवाड जी जोकि राष्ट्रपति सम्मान प्राप्तकर्ता एवं गिनीज वर्ड रिकॉर्ड होल्डर हैं, सनातन गौरव सम्मान प्राप्त किये।
व्यवस्था समिति के सदस्य इस प्रकार रहे - पत्रकार संजय कुमार, सुनील दुग्गल, डॉ. टीकम सिंह, डॉ. यशदेव प्रसाद शर्मा, आचार्य डॉ. देव कुमार पाण्डेय, राकेश कुमार एवं गिरिराज सिंह।
डॉ देवेंद्र सिंह आर्य के बारे में : डॉ देवेंद्र सिंह आर्य उगता भारत के चेयरमैन हैं। विधि व्यवसायी होने के साथ-साथ श्री आर्य समाज सेवी हैं। जो कि वैदिक संस्कृति में आस्था रखते हैं और उसके प्रचार प्रसार के लिए कार्य करते रहते हैं। अभी तक लगभग आधा दर्जन पुस्तक लिख चुके डॉ आर्य पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष रहे हैं। अभी उन्हें गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति पश्चिम उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया है। श्री योगेश त्रेहन ने उनको अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए कहा कि उनकी बौद्धिक क्षमताएं उनकी अवस्था पर हावी रही हैं। जिन्होंने इस अवस्था में जाकर यह सम्मान प्राप्त किया है। इससे पता चलता है कि उनका पुरुषार्थ और परिश्रम उनके व्यक्तित्व की पूंजी है।
डॉ आर्य ने संगठन का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि
वर्तमान समय में भारतीय वैदिक सत्य सनातन संस्कृति के विनाश की योजनाओं में लगी शक्तियों को पहचानने की आवश्यकता है हमें शत्रुबोध ,राष्ट्रबोध और इतिहास बोध होना चाहिए इसके लिए संगठन की गतिविधियों और कार्य शैली कब है हृदय से धन्यवाद करते हैं और इस बात के लिए आभार भी व्यक्त करते हैं कि उन्होंने उनकी प्रतिभा को सम्मानित किया है।
ज्योतिष के बारे में दी गई विशेष जानकारी
श्री प्रमोद तिवारी ने ज्योतिष और कुंडली के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि कुंडली वह चक्र है, जिसके द्वारा किसी इष्ट काल में राशिचक्र की स्थिति का ज्ञान होता है। राशिचक्र क्रांतिचक्र से संबद्ध है, जिसकी स्थिति अक्षांशों की भिन्नता के कारण विभिन्न देशों में एक सी नहीं है। अतएव राशिचक्र की स्थिति जानने के लिये स्थानीय समय तथा अपने स्थान में होनेवाले राशियों के उदय की स्थिति (स्वोदय) का ज्ञान आवश्यक है। हमारी घड़ियाँ किसी एक निश्चित याम्योत्तर के मध्यम सूर्य के समय को बतलाती है। इससे सारणियों की, जो पंचागों में दी रहती हैं, सहायता से हमें स्थानीय स्पष्टकाल ज्ञात करना होता है। स्थानीय स्पष्टकाल को इष्टकाल कहते हैं। इष्टकाल में जो राशि पूर्व क्षितिज में होती है उसे लग्न कहते हैं। तात्कालिक स्पष्ट सूर्य के ज्ञान से एवं स्थानीय राशियों के उदयकाल के ज्ञान से लग्न जाना जाता है। इस प्रकार राशिचक्र की स्थिति ज्ञात हो जाती है। भारतीय प्रणाली में लग्न भी निरयण लिया जाता है। पाश्चात्य प्रणाली में लग्न सायन लिया जाता है। इसके अतिरिक्त वे लोग राशिचक्र शिरोबिंदु (दशम लग्न) को भी ज्ञात करते हैं। भारतीय प्रणाली में लग्न जिस राशि में होता है उसे ऊपर की ओर लिखकर शेष राशियों को वामावर्त से लिख देते हैं। लग्न को प्रथम भाव तथा उसके बाद की राशि को दूसरे भाव इत्यादि के रूप में कल्पित करते हैं1 भावों की संख्या उनकी कुंडली में स्थिति से ज्ञात होती है। राशियों का अंकों द्वारा तथा ग्रहों को उनके आद्यक्षरों से व्यक्त कर देते हैं। इस प्रकर का राशिचक्र कुंडली कहलाता है। भारतीय पद्धति में जो सात ग्रह माने जाते हैं, वे हैं सूर्य, चंद्र, मंगल आदि। इसके अतिरिक्त दो तमो ग्रह भी हैं, जिन्हें राहु तथा केतु कहते हैं। राहु को सदा क्रांतिवृत्त तथा चंद्रकक्षा के आरोहपात पर तथा केतु का अवरोहपात पर स्थित मानते हैं।
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