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रजनी की रेशमी नीरवता में, जाग उठा प्रणय स्वर

रजनी की रेशमी नीरवता में, जाग उठा प्रणय स्वर

कुमार महेंद्र
इस मखमली निशा के आँचल में,
तारे भी ठिठक निहार रहे।
जब साँसों की मृदु लहरों पर,
हम नाम तुम्हारा उतार रहे।
चहुँ ओर बिखरी मौन चाँदनी,
छेड़ रही मन के तार मधुर।
रजनी की रेशमी नीरवता में, जाग उठा प्रणय स्वर।।


पलकों पर ठहरी चंद्रिका-सी,
कोमल कोई मधु-छुअन है।
इस एकांत भरी बेला में,
हर धड़कन में तुम्हारा स्पंदन है।
निद्रित है सारा जगत,
पर जाग रहा मन का भँवर।
रजनी की रेशमी नीरवता में, जाग उठा प्रणय स्वर।।


अधरों पर ठहरी मोहक हँसी,
तेरा ही गीत सुनाती है।
मंद-मंद बहती पुरवाई,
तेरी सुवास ले आती है।
तुम दूर कहीं हो फिर भी प्रिय,
हर श्वास में तेरा ही असर।
रजनी की रेशमी नीरवता में, जाग उठा प्रणय स्वर।।


अब यामिनी ढलने वाली है,
उषा का संदेशा आएगा।
पर हृदय-पटल पर अंकित यह,
प्रीत-भाव नहीं मिट पाएगा।
तेरी एक सौम्य-सी झलक से,
सँवर उठती जीवन की डगर।
रजनी की रेशमी नीरवता में, जाग उठा प्रणय स्वर।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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