हमारे वेदों का अनुवाद कोई और क्यों कर रहा है?
- जब ज्ञान हमने छोड़ा, तो व्याख्या की जमीन भी छोड़ दी
डॉ राकेश दत्त मिश्र
कभी-कभी लगता है कि भारत में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जिस समाज ने वेदों की रचना की, वही आज वेदों को पढ़ने के लिए अनुवाद खोजता है।
जिस समाज ने संस्कृत को देववाणी कहा, उसके बच्चे संस्कृत से दूर होते चले गए।
जिस समाज की सभ्यता का विशाल ज्ञान-संसार वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, दर्शन और स्मृतियों में सुरक्षित है, उसी समाज का बड़ा हिस्सा आज इन ग्रंथों को मूल रूप में पढ़ने में असमर्थ है।
और फिर जब कोई दूसरा व्यक्ति इन्हीं ग्रंथों का दूसरी भाषा में अनुवाद करता है तो हम चौंककर पूछते हैं—
“आखिर हमारे ग्रंथों का अनुवाद कोई और क्यों कर रहा है?”
भाई साहब!
एक बार आईना भी देख लीजिए।
क्योंकि हमने स्वयं पढ़ना छोड़ दिया है।
व्यंग्य की पहली पंक्ति यही होनी चाहिए-“कितनी संस्कृत आती है?”
किसी हिंदू से पूछिए-
“आपने वेद पढ़े हैं?”
उत्तर मिलेगा-
“नहीं, लेकिन वे हमारे वेद हैं।”
पूछिए-
“सामवेद में क्या है?”
उत्तर-
“वह तो पंडितजी जानते होंगे।”
पूछिए-
“गीता का मूल संस्कृत पाठ पढ़ सकते हैं?”
उत्तर-
“हिंदी में अर्थ पढ़ लिया है।”
फिर पूछिए—
“संस्कृत सीखने के लिए क्या किया?”
उत्तर-
“समय नहीं मिला।”
और जब कोई दूसरा व्यक्ति उसी ग्रंथ का अनुवाद करके उसके अर्थ पर चर्चा करता दिखाई देता है, तब अचानक हमारी सांस्कृतिक चेतना जाग जाती है-
“यह हमारे धर्मग्रंथ को कैसे समझा रहा है?”
सवाल जायज है।
लेकिन उससे पहले एक और सवाल होना चाहिए-
“हमने स्वयं क्यों नहीं समझा?”
समस्या अनुवाद नहीं, ज्ञान पर हमारी पकड़ का कमजोर होना है
किसी भी धर्मग्रंथ का दूसरी भाषा में अनुवाद होना अपने आप में गलत नहीं है।
ज्ञान जितनी भाषाओं में पहुँचे, उतना अच्छा।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब मूल भाषा से समाज का संबंध टूट जाता है और फिर समाज अपने ही ग्रंथों की व्याख्या के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है।
यहीं से समस्या गंभीर होती है।
क्योंकि अनुवाद केवल शब्दों का स्थानांतरण नहीं है।
एक संस्कृत शब्द के पीछे कभी-कभी पूरा दार्शनिक संदर्भ होता है।
एक मंत्र के पीछे परंपरा होती है।
एक श्लोक के पीछे व्याकरण होता है।
एक शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं।
ऐसे में अनुवादक की समझ, उसका भाषाई ज्ञान, उसका दार्शनिक दृष्टिकोण और उसकी व्याख्या—सब महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
इसलिए मूल ग्रंथ को जानना केवल धार्मिक अधिकार नहीं, बौद्धिक सुरक्षा भी है।
“हमारे ही पैसे से कोई हमारी संस्कृति समझ रहा है”-क्या हमें यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिए?
यहाँ भावनात्मक प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
भारत में शिक्षा, प्रकाशन, शोध, अनुवाद और सांस्कृतिक गतिविधियों में सार्वजनिक तथा निजी संसाधन लगते हैं। इसलिए यह पूछना बिल्कुल उचित है कि-
क्या भारतीय समाज अपने मूल ग्रंथों के अध्ययन और अनुवाद पर पर्याप्त संसाधन लगा रहा है?
क्या संस्कृत के विद्वानों को पर्याप्त मंच मिल रहा है?
क्या वेदों के प्रमाणिक अनुवाद डिजिटल माध्यम में उपलब्ध हैं?
क्या विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भारतीय ज्ञान परंपरा का गंभीर अध्ययन हो रहा है?
क्या युवा पीढ़ी को केवल “यह हमारा धर्मग्रंथ है” बताया जा रहा है, या उसे यह भी सिखाया जा रहा है कि-
“इसे पढ़ो, समझो, प्रश्न करो और स्वयं प्रमाण खोजो।”
अगर हम इन कामों में पीछे हैं, तो दोष केवल दूसरों का नहीं है।
दोष हमारी अपनी प्राथमिकताओं का भी है।
संस्कृत नहीं जानना-अपने ही घर की चाबी किसी और को देना है
इसे एक उदाहरण से समझिए।
मान लीजिए आपके घर में एक बहुत बड़ा खजाना है।
उस कमरे की चाबी आपके पास है।
लेकिन आपको ताला खोलना नहीं आता।
आपने वर्षों तक उस कमरे की ओर देखा तक नहीं।
अब पड़ोस का व्यक्ति उस कमरे के बाहर बैठकर कहता है-
“मैंने अंदर की चीजों के बारे में पढ़ा है।”
आप नाराज होकर कहते हैं-
“तुम मेरे घर के बारे में कैसे बता सकते हो?”
वह कहता है-
“दरवाजा खोलकर देख लो।”
आप कहते हैं-
“मेरे पास चाबी है, लेकिन मुझे ताला खोलना नहीं आता।”
तो समस्या किसकी है?
पड़ोसी की या चाबी के मालिक की?
यही स्थिति हमारी संस्कृत और अपने प्राचीन ग्रंथों के साथ है।
चाबी हमारे पास है।
लेकिन ताला खोलने का अभ्यास हमने छोड़ दिया है।
सामवेद को ही देख लीजिए
सामवेद भारतीय वैदिक परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं-
“वेदानां सामवेदोऽस्मि।”
अर्थात् वेदों में मैं सामवेद हूँ।
अब प्रश्न यह है कि जिस सामवेद को भगवान श्रीकृष्ण ने अपने स्वरूप से जोड़ा, उसके प्रति आज हमारी जानकारी कितनी है?
कितने युवा सामवेद के बारे में जानते हैं?
कितने लोग उसके मंत्रों की संरचना समझते हैं?
कितने लोग जानते हैं कि सामवेद का संबंध वैदिक गायन और सामगान की परंपरा से किस प्रकार जुड़ा है?
और कितने लोग केवल सोशल मीडिया पर किसी पोस्ट को देखकर यह तय कर लेते हैं कि—
“हमारी संस्कृति पर हमला हो रहा है!”
ज्ञान से पहले आक्रोश और अध्ययन से पहले आरोप-क्या यही हमारी सांस्कृतिक रणनीति होगी?
और फिर शुरू होती है “उर्दू अनुवाद” वाली बहस
मान लीजिए किसी ने गीता, रामायण या किसी वेद का उर्दू में अनुवाद किया।
हम तुरंत पूछते हैं-
“इसने ऐसा क्यों किया?”
प्रश्न करना गलत नहीं।
लेकिन अगला प्रश्न होना चाहिए-
“क्या हमने उसका अनुवाद पढ़ा है?”
फिर-
“क्या हमने मूल संस्कृत से मिलान किया है?”
फिर-
“क्या किसी प्रमाणित संस्कृत विद्वान से उसकी व्याख्या की तुलना की है?”
यदि उत्तर तीनों का “नहीं” है, तो फिर हमारा विरोध किस आधार पर है?
केवल इसलिए कि अनुवादक मुस्लिम है?
यह तर्क पर्याप्त नहीं है।
किसी अनुवाद की आलोचना अनुवाद की गुणवत्ता, संदर्भ, शब्दार्थ और व्याख्या के आधार पर होनी चाहिए, अनुवादक की धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं।
लेकिन हिंदू समाज को एक बात जरूर समझनी होगी
यदि हम चाहते हैं कि हमारे ग्रंथों की व्याख्या हमारे अपने विद्वान भी करें, तो हमें विद्वान तैयार करने होंगे।
यदि हम चाहते हैं कि वेदों का प्रमाणिक अनुवाद हो, तो हमें अनुवादक तैयार करने होंगे।
यदि हम चाहते हैं कि सामवेद पर आधुनिक शोध हो, तो हमें शोधकर्ता तैयार करने होंगे।
यदि हम चाहते हैं कि दुनिया संस्कृत जाने, तो पहले भारत के युवा संस्कृत जानें।
सिर्फ “संस्कृत हमारी भाषा है” कहने से संस्कृत जीवित नहीं रहेगी।
संस्कृत तब जीवित रहेगी जब बच्चे उसे पढ़ेंगे।
वेद तब जीवित रहेंगे जब विद्यार्थी उन्हें समझेंगे।
गीता तब जीवित रहेगी जब युवा उसके श्लोकों का अर्थ स्वयं खोजेंगे।
रामायण तब जीवित रहेगी जब नई पीढ़ी उसे केवल कथा नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य और दर्शन की महान परंपरा के रूप में पढ़ेगी।
पैसा कहाँ लगना चाहिए?
अगर समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर गंभीर है, तो केवल धार्मिक आयोजन करने से काम नहीं चलेगा।
संसाधन लगाने होंगे-
संस्कृत शिक्षा पर
वैदिक अध्ययन पर
प्रामाणिक अनुवाद पर
संस्कृत पांडुलिपियों के संरक्षण पर
डिजिटल वैदिक पुस्तकालयों पर
युवाओं के लिए संस्कृत पाठ्यक्रम पर
वेद और उपनिषद के सरल व्याख्यात्मक संस्करणों पर
आधुनिक शोध पर
भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता वाले प्रकाशन पर
और सबसे महत्वपूर्ण-मूल ग्रंथ पढ़ने की संस्कृति पर।
यदि हम इन क्षेत्रों में निवेश नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ी भी वही करेगी जो आज हम कर रहे हैं-
अपने ही घर के पुस्तकालय के सामने खड़ी होकर किसी दूसरे से पूछेगी-“इसमें लिखा क्या है?”
क्या हमें दूसरे धर्मों की भाषाएँ सीखने से डरना चाहिए?
नहीं।
किसी भी भाषा को सीखना कमजोरी नहीं है।
उर्दू सीखिए।
अरबी सीखिए।
फारसी सीखिए।
अंग्रेजी सीखिए।
लेकिन साथ-साथ संस्कृत भी सीखिए।
ज्ञान का उत्तर अज्ञान नहीं, अधिक ज्ञान है।
अगर कोई व्यक्ति हमारे ग्रंथ को उर्दू में पढ़ता है, तो हमारा उत्तर यह नहीं होना चाहिए कि “तुम क्यों पढ़ रहे हो?”
हमारा उत्तर होना चाहिए—
“बहुत अच्छा। अब हम भी मूल संस्कृत में पढ़ेंगे और देखते हैं कि आपने क्या समझा है।”
यही आत्मविश्वास है।
सबसे बड़ा “सांस्कृतिक संकट” बाहर नहीं, भीतर है
किसी भी सभ्यता को केवल बाहरी चुनौती समाप्त नहीं करती।
सभ्यता तब कमजोर होती है जब उसकी अगली पीढ़ी अपने ज्ञान-स्रोतों से कट जाती है।
यदि बच्चे वेद नहीं पढ़ते,
यदि युवा संस्कृत नहीं जानते,
यदि परिवार गीता को केवल पूजा की वस्तु मानता है,
यदि रामायण केवल टीवी धारावाहिक बनकर रह जाती है,
यदि सामवेद का नाम भी बहुत कम लोग जानते हैं,
तो फिर हमें दूसरों से शिकायत करने से पहले अपने घर में दीपक जलाना होगा।
अंधेरे कमरे में यह शिकायत करना कि पड़ोसी ने टॉर्च क्यों जलाई, समाधान नहीं है।
और यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा व्यंग्य है
हम कहते हैं-
“हमारी संस्कृति महान है।”
दूसरा प्रश्न पूछता है-
“क्यों?”
हम कहते हैं-
“क्योंकि हमारे वेद महान हैं।”
वह पूछता है-
“वेद में क्या लिखा है?”
हम कहते हैं-
“वह तो संस्कृत में है।”
वह पूछता है-
“आप संस्कृत जानते हैं?”
हम कहते हैं-
“नहीं।”
वह पूछता है-
“फिर आपको कैसे पता कि वेद में क्या लिखा है?”
हम कहते हैं-
“किसी ने बताया था!”
बस!
यहीं से व्यंग्य शुरू होता है।
जिस समाज ने अपनी पुस्तकों को स्वयं पढ़ना छोड़ दिया, वह अंततः अपनी ही पुस्तकों की व्याख्या दूसरों से सुनने के लिए मजबूर हो जाता है।
निष्कर्ष: कुल्हाड़ी किसी और के हाथ में नहीं, हमारे हाथ में है
हम अक्सर कहते हैं-
“कोई हमारी जड़ों को काट रहा है।”
लेकिन कभी-कभी जरा पीछे मुड़कर देखिए।
कुल्हाड़ी किसके हाथ में है?
क्या हमने संस्कृत पढ़ना बंद नहीं किया?
क्या हमने अपने बच्चों को अपने ग्रंथों से परिचित कराना बंद नहीं किया?
क्या हमने वेदों को केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं कर दिया?
क्या हमने गीता को जीवन-दर्शन के बजाय केवल पूजा-पाठ की पुस्तक नहीं बना दिया?
क्या हमने रामायण को केवल कथा और सामवेद को केवल “पुराना ग्रंथ” मानकर छोड़ नहीं दिया?
यदि उत्तर हाँ है, तो हमें सबसे पहले अपने भीतर परिवर्तन करना होगा।
दूसरों के अनुवाद पर प्रश्न उठाइए—लेकिन उससे पहले अपना मूल ग्रंथ पढ़िए।
दूसरों की व्याख्या को परखिए—लेकिन उससे पहले स्वयं संस्कृत समझिए।
अपनी संस्कृति की रक्षा कीजिए—लेकिन नारे से नहीं, ज्ञान से।
और सबसे महत्वपूर्ण-
“हमारे ग्रंथों को कोई दूसरा पढ़ रहा है”-इससे डरने की जरूरत नहीं।
“हम स्वयं अपने ग्रंथ नहीं पढ़ रहे”-इससे चिंतित होने की जरूरत है।
क्योंकि जिस दिन हिंदू समाज अपने वेद, उपनिषद, गीता, रामायण और अन्य शास्त्रों को मूल भाषा, प्रमाणिक भाष्य और आधुनिक शोध के साथ पढ़ना शुरू कर देगा, उस दिन किसी भी अनुवाद को देखकर घबराने की आवश्यकता नहीं होगी।
तब हम पूछेंगे-
“आपने क्या अनुवाद किया?”
और उसके बाद संस्कृत का मूल ग्रंथ खोलकर कहेंगे-
“आइए, अब देखते हैं कि मूल में वास्तव में लिखा क्या है।”
यही सांस्कृतिक आत्मविश्वास है।
यही बौद्धिक स्वतंत्रता है। और शायद यही वह काम है जिसे करने के बजाय हम वर्षों से केवल बहस कर रहे हैं।
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