कुंडी
डॉ अवधेश कुमार अवधमैं तुम्हारे दिल की कुंडी खड़खडाऊं,
तुम जगो या ना जगो
ये कौन जाने!
घर में सोये
मां, बहन, भाभी जगें
और मैं भागूं तुम्हें देखे बिना
किंतु फिर भी सर तेरे इल्जाम आए
और पहरा सख़्त बैठे।
इससे बेहतर खोल रक्खो
कुंडियों को
और देहरी पर खड़ी हो
राह तकना
बिन कहे, कुछ भी सुने, देखे बिना
बाहें बढ़ाना
और चुपके से मुझे भरकर हृदय में
राधिका जी की तरह ही
प्रीति की पावन अनोखी
अप्रतिम व अनकही
रस्में निभाना
देह एवं देह- बंधन से परे
सर्वदा ही रूह से
मिलना- मिलाना
प्रेम में पगकर
चलो अमरत्व पाएं
दिल, किवाड़ी, देहरी
व कुंडियों के पार जाएं
इस तरह रिश्ते निभाएं।
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