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फूलों के बगीचे

फूलों के बगीचे

अरुण दिव्यांश
फूलों के सुंदर से बगीचे में ,
रंग बिरंगे फूल खिलते हैं ।
गुजरते जब पास से इसके ,
सुंदर से सुगंध मिलते हैं ।।
जैसे खिलती हैं ये कलियाॅं ,
वैसे ये मन खिल जाता है ।
पल भर को लगता है ऐसे ,
मन स्वर्ग में मिल जाता है ।।
धन्य होता वह ऐसा फूल ,
रंग विरंगा शोर करता है ।
दूर चलते हुए राही को ये ,
सुगंध मन विभोर करता है ।।
बन सक सुगंधित पुष्प बन ,
सुंदर कागज के फूल होते हैं ।
देखना हो गर तुम्हें ऐसे पुष्प ,
ऐसे पुष्प तो बबूल होते हैं ।।
चुन लो फूल और काॅंटों में ,
फूल बनना है या तुम्हें काॅंटा ।
फूल बनोगे तो फूल मिलेगा ,
शूल बनोगे तो मिले सन्नाटा ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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