आखिर भगवान श्री कृष्ण ने क्यों कहा - वेदों में मैं सामवेद हूँ?
- क्या श्रीकृष्ण का सामवेद चयन केवल संगीत के कारण था?
संपादक - डॉ. राकेश दत्त मिश्र
भारत को समझना हो तो केवल भारत का इतिहास पढ़ना पर्याप्त नहीं है। भारत को समझने के लिए उसकी वाणी, वेद, दर्शन, साधना, संस्कृति और चेतना को समझना होगा।
भारत की ज्ञान-परंपरा में वेदों का स्थान मूलाधार का है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद-इन चारों की अपनी विशिष्ट प्रकृति और भूमिका है। ऋग्वेद में ऋचाओं और स्तुतियों की प्रधानता है, यजुर्वेद यज्ञीय कर्म की विधि से जुड़ा है, अथर्ववेद जीवन के अनेक व्यावहारिक और आध्यात्मिक पक्षों को स्पर्श करता है, जबकि सामवेद वैदिक मंत्र को स्वर, लय और गान की साधना से जोड़ता है।
इसीलिए भगवद्गीता के विभूति योग में भगवान श्रीकृष्ण का यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है-
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥
-श्रीमद्भगवद्गीता 10.22
अर्थात्-
“वेदों में मैं सामवेद हूँ, देवताओं में इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ और प्राणियों में चेतना हूँ।”
लेकिन प्रश्न यहीं से प्रारंभ होता है-
श्रीकृष्ण ने यह क्यों नहीं कहा कि वे ऋग्वेद हैं?
उन्होंने सामवेद को ही अपनी विभूति क्यों बताया?
क्या इसका कारण केवल यह था कि सामवेद में मंत्रों को गाया जाता है?
या सामवेद के भीतर ज्ञान से अनुभूति तक पहुँचने का कोई गहरा रहस्य छिपा हुआ है?
यही प्रश्न इस आलेख का केंद्र है।
सामवेद आखिर है क्या?
सामवेद चारों वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है, लेकिन उसका महत्व उसके आकार से नहीं, उसके स्वरूप और प्रयोजन से निर्धारित होता है।
भारत सरकार के Vedic Heritage Portal के अनुसार सामवेद ऋग्वेद से अत्यंत निकटता से जुड़ा है। उसकी संहिता में ऋग्वेद की बड़ी संख्या में ऋचाएँ सम्मिलित हैं और ये मुख्यतः सोमयाग आदि वैदिक अनुष्ठानों में उद्गाता द्वारा गाए जाने के लिए प्रयुक्त होती थीं। सामवेद की ऋचाएँ अपने पूर्ण संगीतात्मक स्वरूप को विभिन्न गान-ग्रंथों में प्राप्त करती हैं।
अर्थात् सामवेद को समझने के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि “यह संगीत का वेद है।”
वास्तव में यह कहना अधिक उचित होगा—
सामवेद वह वैदिक परंपरा है जिसमें मंत्र शब्द से आगे बढ़कर स्वर और साधना का रूप ग्रहण करता है।
सामवेद की पाँच ऋचाएँ और उनका संदेश
अब आइए सामवेद की कुछ ऋचाओं के माध्यम से यह समझने का प्रयास करें कि सामवेद के भीतर कौन-सी चेतना प्रवाहित होती है।
1. अग्ने आ याहि वीतये
सामवेद के प्रारंभिक मंत्रों में अग्नि का आह्वान मिलता है—
अग्ने आ याहि वीतये
गृणानो हव्यदातये।
नि होता सत्सि बर्हिषि॥
सरल अर्थ:
हे अग्नि! यज्ञ के लिए हमारे पास आइए। हमारी स्तुति स्वीकार कीजिए और यज्ञ में होता के रूप में विराजमान होइए।
सामवेद की उपलब्ध पाठ-परंपरा में यह आरंभिक ऋचा अग्नि-काण्ड के प्रारंभ में आती हैयहाँ अग्नि केवल भौतिक अग्नि नहीं है।
वह प्रकाश का प्रतीक है।
ऊर्जा का प्रतीक है।
परिवर्तन का प्रतीक है।
और मनुष्य तथा देवत्व के बीच सेतु का प्रतीक है।
यही कारण है कि वैदिक चिंतन में अग्नि का स्थान इतना महत्वपूर्ण है।
2. त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः
अगली ऋचा में कहा गया है-
त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः।
देवेभिर्मानुषे जने॥
सरल अर्थ:
हे अग्नि! आप यज्ञों के होता हैं और सभी के हितकारी हैं। देवताओं के साथ मानव समुदाय में भी आपका महत्व है।
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण विचार सामने आता है-
अग्नि केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं, सामूहिक कल्याण की शक्ति है।
यज्ञ का मूल भाव भी केवल “मैं” नहीं बल्कि “हम” है।
आज के स्वार्थप्रधान समय में यह विचार कितना प्रासंगिक है!
आज व्यक्ति पूछता है-
मुझे क्या मिलेगा?
वेद पूछता है-
मेरे कर्म से समष्टि को क्या मिलेगा?
यही अंतर भारतीय चिंतन को केवल व्यक्तिगत साधना से आगे बढ़ाकर सामाजिक दर्शन का रूप देता है।
3. अग्निं दूतं वृणीमहे
सामवेद में अग्नि के संबंध में एक और ऋचा है-
अग्निं दूतं वृणीमहे
होतारं विश्ववेदसम्।
अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्॥
सरल अर्थ:
हम अग्नि को अपना दूत और होता स्वीकार करते हैं, जो सबको जानने वाला है और यज्ञ को उचित प्रकार से सम्पन्न कराने वाला है।
यहाँ अग्नि को दूत कहा गया है।
दूत वह होता है जो एक स्थान की बात दूसरे स्थान तक पहुँचाता है।
आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में अग्नि मनुष्य की आहुति को देवत्व तक पहुँचाने वाला माध्यम बनती है।
इसमें एक गहरा संदेश है-
मनुष्य के कर्म और उसके उच्च उद्देश्य के बीच एक माध्यम चाहिए।
वह माध्यम कर्म की शुद्धता, संकल्प की पवित्रता और साधना की अग्नि हो सकती है।
4. अग्नि को अतिथि के रूप में देखना
सामवेद की आरंभिक ऋचाओं में अग्नि के लिए कहा गया है-
श्रेष्ठं वो अतिथिं स्तुषे
मित्रमिव प्रियम्॥
अर्थात् अग्नि को श्रेष्ठ अतिथि और प्रिय मित्र के समान माना गया है।
यहाँ भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत सुंदर तत्व सामने आता है-
अतिथि देवो भव।
अग्नि देवता है, लेकिन वह केवल दूर आकाश में स्थित कोई अमूर्त सत्ता नहीं। वह मनुष्य के घर में भी उपस्थित है, यज्ञशाला में भी उपस्थित है और उसकी दैनिक जीवन-व्यवस्था में भी उपस्थित है।
इसलिए भारतीय संस्कृति में अग्नि केवल पूजा की वस्तु नहीं रही; वह गृहस्थ जीवन की साक्षी भी रही।
5. सामवेद की एक और महत्वपूर्ण ऋचा - “ऋचं साम यजामहे”
सामवेद की एक अत्यंत अर्थपूर्ण ऋचा है-
ऋचं साम यजामहे
याभ्यां कर्माणि कृण्वते।
वि ते सदसि राजतो
यज्ञं देवेषु वक्षतः॥
इसका भावार्थ है कि ऋचा और साम के माध्यम से यज्ञीय कर्म सम्पन्न होता है।
यहाँ स्वयं ऋचा और साम के संबंध का संकेत मिलता है।
अर्थात्—
ऋचा शब्द है और साम उस शब्द की गेय अभिव्यक्ति।
यहीं से सामवेद की विशिष्टता समझ में आती है।
शब्द और स्वर में क्या अंतर है?
मान लीजिए कोई व्यक्ति कहता है-
“मुझे दुःख है।”
यह एक सूचना है।
लेकिन वही व्यक्ति जब उसी भाव को स्वर, लय और संगीत में व्यक्त करता है तो वह केवल सूचना नहीं रह जाती-वह अनुभूति बन जाती है।
यही सामवेद की शक्ति को समझने की एक सरल कुंजी है।
ऋग्वेद का मंत्र अर्थ देता है।
सामवेद उसी वैदिक वाणी को स्वर देता है।
स्वर भावना को जगाता है।
भावना साधना को जन्म देती है।
और साधना मनुष्य को अनुभूति की ओर ले जाती है।
इसलिए सामवेद का महत्व केवल संगीत में नहीं है।
क्या श्रीकृष्ण का सामवेद चयन केवल संगीत के कारण था?
नहीं-केवल संगीत के कारण ऐसा समझना सामवेद और श्रीकृष्ण दोनों के कथन को सीमित कर देना होगा।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी।
भगवद्गीता का दसवाँ अध्याय विभूति योग है। इसमें श्रीकृष्ण विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट विभूतियों का उदाहरण देते हैं।
वे कहते हैं-
“वेदों में मैं सामवेद हूँ।”
इसके बाद-
“देवताओं में मैं वासव अर्थात् इन्द्र हूँ।”
फिर-
“इन्द्रियों में मैं मन हूँ।”
और-
“भूतों में मैं चेतना हूँ।”
ध्यान दीजिए-
यहाँ श्रीकृष्ण केवल संगीत की सूची नहीं बना रहे।
वे श्रेष्ठता के प्रतिनिधि रूपों की ओर संकेत कर रहे हैं।
वेदों में सामवेद, देवताओं में इन्द्र, इन्द्रियों में मन और जीवों में चेतना।
अर्थात् प्रत्येक समूह में वह तत्व जो उसे विशिष्ट रूप से संचालित या अभिव्यक्त करता है।
इसीलिए सामवेद का चयन केवल “गायन” के कारण मान लेना अधूरा होगा।
सामवेद - ज्ञान से उपासना तक
भारत सरकार के Vedic Heritage Portal की व्याख्या में भी सामवेद को उपासना और भक्ति की दिशा से जोड़ा गया है। वहाँ यह भी बताया गया है कि सामवेद में इन्द्र, अग्नि और सोम की स्तुतियाँ प्रमुख हैं और उसके मंत्र सामगान के माध्यम से यज्ञीय उपासना में प्रयुक्त होते हैं।
यहीं श्रीकृष्ण के कथन की एक महत्वपूर्ण व्याख्या सामने आती है।
ज्ञान जब केवल बुद्धि में रहता है तो वह जानकारी है।
ज्ञान जब हृदय में उतरता है तो वह श्रद्धा है।
ज्ञान जब जीवन में उतरता है तो वह साधना है।
और सामवेद ज्ञान को स्वर और उपासना के माध्यम से अनुभूति से जोड़ता है।
सामवेद और श्रीकृष्ण की बांसुरी
अब इस विषय का सबसे सुंदर सांस्कृतिक पक्ष।
भारतीय लोकचेतना में श्रीकृष्ण की पहचान मुरलीधर के रूप में भी है।
बांसुरी की अपनी कोई आवाज नहीं होती।
वह भीतर से लगभग रिक्त होती है।
जब वायु उसके भीतर प्रवेश करती है, तब संगीत जन्म लेता है।
क्या इसे सामवेद के संदर्भ में एक आध्यात्मिक प्रतीक की तरह देखा जा सकता है?
हाँ-एक दार्शनिक रूपक के रूप में।
मनुष्य का अहंकार जितना अधिक होता है, उसके भीतर उतना ही अधिक शोर होता है।
मनुष्य जितना अपने अहंकार को खाली करता है, उतनी ही संभावना होती है कि उसके भीतर से कोई सुंदर स्वर निकले।
बांसुरी का संदेश मानो यह हो-
“मैं स्वयं कुछ नहीं; मैं केवल माध्यम हूँ।”
और सामवेद का संदेश है-
“मंत्र को केवल बोलो नहीं, उसे साधो और स्वर दो।”
इन दोनों में एक सांस्कृतिक साम्य दिखाई देता है—मनुष्य को माध्यम बनने की क्षमता।
सामवेद और भारतीय संगीत
सामवेद को भारतीय संगीत की संपूर्ण उत्पत्ति का अकेला स्रोत घोषित करना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। भारतीय संगीत अनेक परंपराओं और ग्रंथों के दीर्घ विकास का परिणाम है।
लेकिन सामवेद की स्वरप्रधान और गेय वैदिक परंपरा भारतीय संगीत-इतिहास की अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण धाराओं में से एक है। भारत सरकार का Vedic Heritage Portal भी सामवेद को ऋचाओं के सामगान से जोड़ता है और उसकी विभिन्न शाखाओं तथा गान-परंपराओं का उल्लेख करता है।
अर्थात् भारतीय संगीत की चर्चा करते समय सामवेद को नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं।
सामवेद हमें आज क्या सिखाता है?
यह प्रश्न आज अधिक महत्वपूर्ण है।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ सूचना बहुत है, लेकिन शांति कम है।
शब्द बहुत हैं, लेकिन संवाद कम है।
भाषण बहुत हैं, लेकिन श्रवण कम है।
तर्क बहुत हैं, लेकिन आत्ममंथन कम है।
सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति बोलना चाहता है, लेकिन दूसरे को सुनना कोई नहीं चाहता।
सामवेद हमें इसके विपरीत एक संस्कृति की याद दिलाता है—
वाणी में स्वर हो।
स्वर में मर्यादा हो।
ज्ञान में विनम्रता हो।
साधना में अनुशासन हो।
और शक्ति में लोककल्याण की भावना हो।
यही सामवेद का आधुनिक पाठ हो सकता है।
सामवेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, एक जीवन-दृष्टि
यदि सामवेद को केवल यज्ञ में गाए जाने वाले मंत्रों का संग्रह मान लिया जाए तो हम उसके दार्शनिक महत्व को बहुत छोटा कर देंगे।
सामवेद हमें एक प्रक्रिया दिखाता है-
शब्द → स्वर → भावना → साधना → अनुभूति
यह प्रक्रिया केवल धार्मिक जीवन की नहीं, बल्कि मनुष्य के पूरे जीवन की प्रक्रिया हो सकती है।
शिक्षा में भी यही चाहिए।
ज्ञान केवल परीक्षा पास करने का साधन न हो; वह चरित्र निर्माण करे।
राजनीति में भी यही चाहिए।
वाणी केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम न हो; वह लोकसेवा का माध्यम बने।
धर्म में भी यही चाहिए।
अनुष्ठान केवल प्रदर्शन न बने; वह आत्मशुद्धि का साधन बने।
और समाज में भी यही चाहिए।
हमारे शब्द केवल विवाद पैदा न करें; वे समाज को जोड़ने वाले बनें।
“वेदानां सामवेदोऽस्मि” का वास्तविक संकेत
अब हम फिर श्रीकृष्ण के उसी वाक्य पर लौटते हैं—
वेदानां सामवेदोऽस्मि।
श्रीकृष्ण ने यह नहीं कहा कि केवल वही मंत्र महान हैं जो गाए जाते हैं।
बल्कि विभूति योग के संदर्भ में सामवेद का चयन हमें यह सोचने का अवसर देता है कि ज्ञान का वह रूप क्या है जो मनुष्य को भीतर से स्पर्श करता है?
सामवेद में शब्द है, लेकिन शब्द अकेला नहीं।
उसमें मंत्र है, लेकिन मंत्र अकेला नहीं।
उसमें स्वर है, लेकिन स्वर अकेला नहीं।
उसमें यज्ञ है, लेकिन यज्ञ अकेला नहीं।
इन सबके बीच उपासना और अनुभूति की एक परंपरा दिखाई देती है।
यही उसकी विशिष्टता है।
आज आवश्यकता सामवेद को सुनने की ही नहीं, समझने की है
हमारी परंपरा को लेकर दो प्रकार की अतियाँ दिखाई देती हैं।
एक ओर वे लोग हैं जो वेदों को केवल अतीत की वस्तु मानकर छोड़ देना चाहते हैं।
दूसरी ओर वे लोग हैं जो वेदों में हर आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कार का दावा खोजने लगते हैं।
दोनों दृष्टियों के बीच एक तीसरा मार्ग भी है-
वेदों को उनके वास्तविक संदर्भ में पढ़िए।
मंत्रों को समझिए।
उनकी भाषा और परंपरा को जानिए।
उनके दार्शनिक संकेतों पर विचार कीजिए।
और फिर देखिए कि वे आज के मनुष्य को क्या दे सकते हैं।
यही वैज्ञानिक और सांस्कृतिक ईमानदारी का मार्ग है।
निष्कर्ष
सामवेद हमें केवल संगीत नहीं देता।
वह हमें बताता है कि ज्ञान को हृदय तक पहुँचाने के लिए केवल शब्द पर्याप्त नहीं हैं।
शब्द को सत्य चाहिए।
सत्य को साधना चाहिए।
साधना को अनुशासन चाहिए।
और अनुशासन को अंततः अनुभूति में बदलना चाहिए।
इसीलिए श्रीकृष्ण का-
“वेदानां सामवेदोऽस्मि”
भारतीय दर्शन का एक अत्यंत गहरा वाक्य बन जाता है।
सामवेद हमें यह याद दिलाता है कि जीवन केवल बोलने का नाम नहीं है-जीवन एक लय है।
धर्म की लय हो।
ज्ञान की लय हो।
कर्म की लय हो।
प्रकृति की लय हो।
और अंततः आत्मा की भी एक लय हो।
जिस दिन मनुष्य अपने भीतर उस लय को सुन लेगा, उस दिन उसे बाहरी शोर में भी सत्य और असत्य का अंतर समझ में आने लगेगा।
और शायद इसी गहरे अर्थ में श्रीकृष्ण का संदेश हमें आज भी पुकारता है—
वेदानां सामवेदोऽस्मि।
मैं वेदों में सामवेद हूँ।
अर्थात् जहाँ ज्ञान स्वर पाता है, जहाँ मंत्र अनुभूति बनता है, जहाँ साधना हृदय को स्पर्श करती है, वहाँ दिव्यता की अनुभूति संभव है।
- डॉ. राकेश दत्त मिश्र
संपादक, दिव्य रश्मि
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