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"रास-अमृत अथवा मुरली-निनाद"

"रास-अमृत अथवा मुरली-निनाद"

पंकज शर्मा ‘कमळ सनातनी’
वंशी के पावन रंध्रों से,
फूटा मधुरिम गान।
जाग उठी सारी प्रकृति,
पाकर नव संधान।
निशि का सघन तिमिर छँटा,
फैला दिव्य प्रकाश।
कृष्ण-कांति के दर्शन से,
मिटा जगत का त्रास।


सुधा-स्वर जब बहने लगा,
पुलकित हुआ वृंदावन।
यमुना की लहरें झूम उठीं,
महका सारा कानन।
कण-कण में रस भरने लगा,
मधुर हुआ संसार।
मुरली के उस नाद में,
जागा प्रेम अपार।


गोप छोड़ अपने काज सभी,
दौड़े वंशी-धाम।
धेनु छोड़कर गोष्ठ चलीं,
भूल गईं विश्राम।
बछड़े भी सुनने लगे,
मुरली का मधु-गान।
वन-उपवन सब थम गए,
मुग्ध हुआ हर प्राण।


छोड़ भवन और लोक-लाज,
गोपियाँ आईं पास।
मुरली की मधुर तान में,
भूलीं निज आभास।
टूटे सारे बंधन तब,
मिटा देह-अभिमान।
गोविंद के चरणों में,
अर्पित हुआ स्व-प्राण।


जैसे बूँद समा जाती,
यमुना की जलधार।
जैसे स्वर में स्वर मिलकर,
हो जाता एकाकार।
वैसे हरि के प्रेम में,
डूबा गोपी-मन।
द्वैत सभी विलीन हुआ,
शेष रहा केवल एकत्व।


सब कुछ तजकर, सब भूलकर,
मैं भी हरि में लीन।
मुरली के उस नाद में,
हर सीमा हुई क्षीण।
शांत हुआ मन का परिताप,
मिटा हृदय का संताप।
राधा-माधव के प्रेम में,
मिला स्वयं का आप।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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