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तुम्हारी सादगी में, प्रणय की झंकार

तुम्हारी सादगी में, प्रणय की झंकार

कुमार महेंद्र
न कंचन का आभूषण,
न रूप-सज्जा का श्रृंगार।
न अधरों पर कृत्रिम हँसी,
न नयनों में भार।
सहज सलोना रूप तुम्हारा,
प्रकृति का अनुपम उपहार।
तुम्हारी सादगी में, प्रणय की झंकार।।


झुकी पलकों की छाँव तले,
सिमटी कोमल-सी लाज।
तपते मरु में जैसे बहती,
शीतल मंद-मंद बयार।
मौन तुम्हारा कह जाता है,
मन के भाव अपार।
तुम्हारी सादगी में, प्रणय की झंकार।।


न कस्तूरी की चाह तुम्हारी,
न पुष्पों की मधुर सुवास।
तुम्हारी पावन उपस्थिति ही,
मेरे उर की मधुर आस।
भोर की ओस-सी निर्मल,
अछूती कली-सा श्रृंगार।
तुम्हारी सादगी में, प्रणय की झंकार।।


तेरे आँचल की शीतल पवन,
महका देती मन-उपवन।
तेरे आने से खिल उठता,
मेरा सूना अंतर्मन।
सहज तुम्हारा रूप ही जैसे,
प्रेम-पुष्प का प्रथम प्रसार।
तुम्हारी सादगी में, प्रणय की झंकार।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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