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महाकाल के दर्शन की यात्रा और एक अधूरा सपना

महाकाल के दर्शन की यात्रा और एक अधूरा सपना

डॉ. राकेश दत्त मिश्र
आज 15 सितंबर है। यह वही तारीख है जिसका इंतजार हम पिछले कई दिनों से कर रहे थे। आज मुझे अपनी पत्नी सुनीता के साथ पटना से उज्जैन के लिए निकलना था और 20 सितंबर को वापस पटना लौटना था। यह यात्रा हमारे लिए केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि सुनीता की एक बहुत पुरानी इच्छा को पूरा करने का अवसर थी। उनकी बड़ी इच्छा थी कि बाबा महाकाल के दर्शन करें। हमने योजना बनाई, टिकट बुक किए और मन में उस दिन की तस्वीर सजाने लगे, जब हम उज्जैन पहुंचकर महाकाल के दरबार में खड़े होंगे। हमारे मित्र राजीव झा और उनका परिवार भी इस यात्रा में हमारे साथ था। सबके मन में एक अलग उत्साह था। शायद हममें से किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि जिस यात्रा के लिए हम इतने दिनों से तैयारी कर रहे हैं, वह यात्रा अपने गंतव्य तक पहुंचने से पहले ही समाप्त हो जाएगी।

आज 15 सितंबर है, लेकिन हम पटना से उज्जैन नहीं जा रहे हैं। टिकट रद्द हो चुके हैं, यात्रा स्थगित हो चुकी है और उस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण यात्री-सुनीता-अब हमारे बीच नहीं है।

कितना अजीब है जीवन भी। हम अपनी सुविधा के अनुसार तारीख तय करते हैं, टिकट बुक करते हैं, रास्ता तय करते हैं और सोचते हैं कि अमुक दिन अमुक स्थान पर होंगे, लेकिन शायद ऊपर बैठा कोई और ही हमारे लिए यात्राओं का निर्धारण कर रहा होता है। हम सोच रहे थे कि सुनीता को महाकाल के दर्शन कराने उज्जैन ले जाएंगे, लेकिन महाकाल ने उन्हें उज्जैन आने का इंतजार ही नहीं कराया। उन्होंने अपनी भक्त को अपने पास ही बुला लिया।

आज जब 15 सितंबर की तारीख सामने है तो मन बार-बार उसी यात्रा की ओर लौट जाता है। लगता है जैसे अभी सुनीता साथ होंगी, यात्रा की तैयारी कर रही होंगी, रास्ते की बातें सोच रही होंगी और उज्जैन पहुंचकर महाकाल के दर्शन को लेकर उत्साहित होंगी। मन में एक तस्वीर बनती है कि मंदिर के गर्भगृह के सामने खड़ी होकर वह बाबा महाकाल के चरणों में अपना सिर झुका रही हैं और मैं उनके चेहरे पर उस संतोष और खुशी को देख रहा हूं, जिसकी उन्हें लंबे समय से प्रतीक्षा थी। लेकिन अगले ही क्षण वास्तविकता सामने आ जाती है और मन भीतर तक टूट जाता है-वह तो अब यहां हैं ही नहीं।

जिसे महाकाल के दर्शन कराने हम उज्जैन ले जाना चाहते थे, महाकाल ने उसे अपने ही चरणों में बुला लिया।


शायद यही ईश्वर की लीला है, जिसे समझना मनुष्य के लिए संभव नहीं। हम अपनी तरफ से यात्रा बनाते हैं, लेकिन अंतिम यात्रा का निर्णय कोई और करता है। सुनीता की इच्छा थी कि वह महाकाल के दर्शन करें। शायद उनकी भक्ति और पुकार इतनी गहरी थी कि बाबा ने उन्हें अपने मंदिर तक आने की प्रतीक्षा नहीं कराई। उन्होंने कहा होगा-“तुम मुझे देखने इतनी दूर क्यों आओगी, मैं ही तुम्हें अपने पास बुला लेता हूं।”

सुनीता के जाने के बाद मुझे लगा था कि यह यात्रा केवल मेरी समाप्त हुई है। लेकिन तब मेरे मित्र राजीव झा ने यह एहसास कराया कि यह यात्रा केवल मेरी नहीं थी। राजीव जी और उनका पूरा परिवार भी हमारे साथ उज्जैन जाने वाला था। उन्होंने भी इस यात्रा के लिए अपना समय निकाला था, टिकट बुक कराए थे और सुनीता की इच्छा को पूरा होते देखने की खुशी अपने मन में संजोई थी। लेकिन सुनीता के चले जाने के बाद उन्होंने भी यात्रा स्थगित कर दी।

राजीव जी ने जो कहा, वह मेरे हृदय में हमेशा के लिए अंकित हो गया-“जिसके कारण हम सबने यात्रा बनाई थी, जब वही नहीं हैं तो यात्रा किस काम की?”

उनका यह वाक्य मेरे लिए केवल एक मित्र का कहा हुआ वाक्य नहीं था। उसमें अपनापन था, संवेदना थी और सुनीता के प्रति वह सम्मान था जो शायद शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने और उनके परिवार ने भी अपनी यात्रा रद्द कर दी और आखिरकार हमें सभी टिकट रद्द करवाने पड़े।

कुछ समय पहले जिन टिकटों को देखकर मन में खुशी होती थी, उन्हीं टिकटों को रद्द करवाते समय मन भारी था। कागज का वह छोटा सा टिकट अब केवल यात्रा का प्रमाण नहीं था, वह सुनीता के एक सपने की निशानी बन गया था। टिकट रद्द हो सकता था, यात्रा रद्द हो सकती थी, लेकिन उस टिकट के साथ जुड़ी उम्मीदों और भावनाओं को कैसे रद्द किया जा सकता था?

आज उज्जैन वही है। महाकाल वही हैं। मंदिर वही है। वहां घंटियां आज भी बज रही होंगी, भक्त आज भी बाबा के दर्शन के लिए कतार में खड़े होंगे, आरती हो रही होगी और “हर-हर महादेव” के जयकारे गूंज रहे होंगे। लेकिन हमारे लिए उज्जैन अब पहले जैसा नहीं रहा। हमारे लिए उज्जैन का अर्थ बदल गया है। वहां जाने की खुशी अब एक अधूरी इच्छा और एक गहरी स्मृति में बदल गई है।

कभी सोचता हूं कि यदि आज सुनीता मेरे साथ होतीं तो हम इस समय यात्रा पर होते। रास्ते में उनसे बातें होतीं। शायद वह बार-बार पूछतीं कि उज्जैन कितनी दूर है। शायद मंदिर पहुंचने की जल्दी होती। शायद महाकाल के दर्शन के बाद उनके चेहरे पर एक ऐसी खुशी होती जिसे देखकर मेरी सारी थकान समाप्त हो जाती। और शायद लौटते समय वह कहतीं कि उनकी बहुत पुरानी इच्छा पूरी हो गई।

लेकिन अब वह सब केवल कल्पना में है।

20 सितंबर को हमें उज्जैन से वापस पटना लौटना था। हमने सोचा था कि महाकाल का प्रसाद साथ होगा, दर्शन की स्मृतियां होंगी और सुनीता के चेहरे पर संतोष होगा। लेकिन अब 20 सितंबर की वह वापसी भी कभी नहीं होगी। क्योंकि जीवन की कुछ यात्राओं में वापसी का टिकट नहीं होता।

सुनीता अपनी अंतिम यात्रा पर निकल चुकी हैं।

उस यात्रा का टिकट मैंने बुक नहीं किया था। उसकी तारीख मैंने तय नहीं की थी। उसका रास्ता मुझे मालूम नहीं था। लेकिन वह यात्रा सबसे निश्चित थी और उसकी मंजिल थी-महाकाल के चरण।

शायद यही सोचकर मन को थोड़ी सांत्वना मिलती है कि सुनीता कहीं दूर नहीं गई हैं। वह उसी महाकाल की शरण में हैं, जिनके दर्शन की इच्छा उनके मन में थी। हम उन्हें महाकाल के मंदिर तक नहीं ले जा सके, लेकिन शायद महाकाल ने उन्हें अपने मंदिर से भी आगे, अपने चरणों में स्थान दे दिया।

आज 15 सितंबर को हमारे पास यात्रा का टिकट नहीं है। वह रद्द हो चुका है। लेकिन मेरे पास सुनीता की यादों का कोई टिकट नहीं है जिसे रद्द किया जा सके। उनकी आवाज, उनकी मुस्कान, उनकी इच्छाएं और उनके साथ बिताए हुए अनगिनत क्षण आज भी मेरे साथ हैं। राजीव झा और उनके परिवार का वह अपनापन भी इस यात्रा की स्मृति का हिस्सा बन गया है।

अब कभी उज्जैन जाऊंगा तो शायद अकेला नहीं जाऊंगा। सुनीता मेरे साथ नहीं होंगी, लेकिन उनकी स्मृतियां मेरे साथ होंगी। महाकाल के सामने खड़ा होकर शायद मेरी आंखें भर आएंगी और मैं बाबा से केवल इतना कहूंगा-“बाबा, जिसे आपके दर्शन कराने मैं यहां लाना चाहता था, उसे आपने अपने पास ही बुला लिया। अब उसकी ओर से यह प्रणाम स्वीकार कर लीजिए।”

सुनीता, आज 15 सितंबर है। आज तुम्हें मेरे साथ उज्जैन जाना था। आज तुम्हें महाकाल के दर्शन करने थे। आज तुम्हारी वह इच्छा पूरी होनी थी। लेकिन जीवन ने कुछ और लिख रखा था। तुम्हारी जगह आज मेरी आंखों में तुम्हारी यादें हैं और हाथों में उस यात्रा की स्मृति, जिसका टिकट अब रद्द हो चुका है।

लेकिन एक बात मैं आज पूरे विश्वास से कह सकता हूं-टिकट रद्द हुआ है, यात्रा नहीं।

तुम्हारी सांसारिक यात्रा भले ही समाप्त हो गई, लेकिन महाकाल के प्रति तुम्हारी आस्था की यात्रा पूरी हो गई है। तुम महाकाल को देखने नहीं जा सकीं, लेकिन महाकाल ने तुम्हें अपने पास बुला लिया।

शायद यही तुम्हारी सबसे बड़ी यात्रा थी और शायद यही तुम्हारी सबसे बड़ी मंजिल भी।

आज मेरी आंखों के सामने उज्जैन नहीं, तुम्हारा चेहरा है। महाकाल के मंदिर की कल्पना करते हुए भी मुझे तुम्हारी ही छवि दिखाई देती है। मन में बस यही प्रार्थना उठती है कि हे बाबा महाकाल, मेरी सुनीता को अपने चरणों में स्थान देना, उसकी उस इच्छा को स्वीकार करना जिसके लिए वह आपके दर्शन करने आने वाली थी और उसे अपनी शरण में सदैव रखना।

और सुनीता, जहां भी हो, बस इतना जानना कि 15 सितंबर की वह यात्रा भले ही रद्द हो गई, लेकिन तुम्हारे साथ मेरी जीवन यात्रा कभी रद्द नहीं होगी।

तुम मेरे साथ चल नहीं रहीं, लेकिन मेरी हर स्मृति में मेरे साथ चलती रहोगी।

तुम महाकाल के दर्शन करने उज्जैन नहीं जा सकीं,
महाकाल ने तुम्हें स्वयं अपने पास बुला लिया।

हर-हर महादेव।
ॐ नमः शिवाय।
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