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सुनने का धैर्य

सुनने का धैर्य

जय प्रकाश कुवंर
हकीकत लिख रहा हूँ,
आज कल के इस जमाने की।
विषय छोटा सा है बस,
बात केवल सुनने सुनाने की।।
हर कोई सुनाना चाहता है,
सुनने को कोई तैयार नहीं।
खुद की समझदारी बहुत बड़ी है,
दूसरों की बातें बेकार रहीं।।
लोग अपनी गीत गाये जा रहे हैं,
उनके चमचे ताली बजाये जा रहे हैं।
अपना कुछ नहीं, लिखित बातों को,
पढ़कर चिल्लाये जा रहे हैं।।
मजाल की दूसरा कुछ कह पाए,
धक्का देकर बाहर भगाया जाए।।
ऐसे लोगों को दूसरों की बात,
अच्छी भी है तो समझ न आए।।
ऐसे लोग दूसरों के आगे,
सिर्फ चिल्लाये जा रहे हैं।
अपनी बेतुकी बातों को,
चिल्ला कर दुहराये जा रहे हैं।।
तुम्हारी अच्छी बातें बेकार हैं,
उसे सुनने को कोई नहीं तैयार है।
उनकी सब बस केवल सुनते रहो,
तुम्हारा कहना बेकार है।।
ऐसे लोग केवल सुनाते रहेंगे,
इससे क्या कर पाएंगे।
कभी दूसरों की भी सुनेंगे तो,
समस्याओं को सुलझा पाएंगे।।
केवल सुनाने में श्रम मत खर्चो,
सुनने का भी धैर्य रखो।
सुनाना तुम्हारी अपनी बुद्धि है,
दूसरों का भी सुनकर कुछ नया सिखो।।

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